कोण °(0•360)°
कोण °(0•360)°
* ब्रह्मांडीय कल्याणि शिव–शक्ति : कोण से जीवन परिचय:-
* 01️⃣ कोण ००००(०१) :— प्रथम प्रक्षितिज बिन्दु : (01|•१) सू–{07|०७} सुरज:- सू|सुरज ब्रह्मांड की मूल प्रकाश–शक्ति है।…
* यहीं से ऊर्जा, समय और जीवन चक्र प्रारंभ होता है…
* यह शिव तत्व का सक्रिय स्वरूप है :— स्थिर होते हुए भी सबको चलाने वाला सुरज स्थिर है…
* ब्रह्मांडीय शक्ति सूरज के अलावा बाकि सभी सुर्य की धूरी दुरी पर गतिशील संतुलित समृद्ध साम्राज्य कि ओर इंगित करता है…
* 02️⃣ कोण ००००११(०२) — द्वितीय आवरण : (02) जल :- जल आवरण शक्ति है....
* :— जो सूर्य की ऊर्जा को धारण, प्रवाहित और संतुलित करता है…
* जीवन की निरंतरता जल पर निर्भर है, यही शक्ति का संरक्षण है…
* 03️⃣ कोण ००००१११(०३) — तृतीय चरण : (03) पवन :- पवन गतिशील चेतना है…
* यह प्राण, संचार और परिवर्तन का माध्यम, बिना पवन के न जल और न जीवन सक्रिय हो सकता है…
* 04️⃣ कोण ००००११११(०४) — चतुर्थ श्रेणी : (04) धरा / स्थूल पवन :- यह क्रियाशील धरातल है…
* जहाँ ऊर्जा करम बनती है, बीज भूमि से जुड़ता है और बिज़ परिणाम प्रकट करता है…
* 05️⃣ कोण ००००१११११(०५) — पंचक काल चक्र : {(05) ००|00} आकाश :- आकाश शुन्य शून्य–धारक है…
* यह सबको (००६- ०१) षरीर स्थान देता है, पर स्वयं बंधता नहीं…
* यही काल, दिशा और संभावना संचालन क्षेत्र है…
* 06️⃣ कोण ००००११११११(०६) — प्राण और सम्भोग–संतुलन :- यहाँ जीवन प्राणी–प्रकृति के सम्भोग नियम से चलता है:-
???? (06) छः पांव सम्भोग — पशु :- पूर्ण इंद्रिय–सक्रियता, पर चेतन संतुलन का अभाव…
???? (02) दो पाँव — पक्षी :- अंडा–सम्भोग, सीमित संसाधन, पर उड़ान का विवेक…
???? (00) पाँव–विहीन — सर्प :- सम्पूर्ण शरीर–स्पर्श सम्भोग, विष = असंतुलन की चेतावनी…
* ???? अधर–आधार सम्भोग संतुलन सिद्धांत (मानव के लिए) :- बीज → बिज़ → रोशनी → शेरनी (ऊर्जा)…
* बच्चेदानी = गर्भगृह ;- जब सम्भोग अधर (भूमि) और आधार (चेतना) से जुड़ता है तभी संतुलित सृष्टि प्राणि जीवन जनम लेती है…
* :: ⚠️ (04) चार पाँव सम्भोग — असंतुलन
कंडोम, निरोध, वीर्य अवरोध, भोग प्रधानता :- ब्रह्मचर्य का अणु पिण्ड अभाव ➡️ परिणाम: वंश, संस्कार और प्रकृति कर विच्छेद :-
* मानव निर्मित सरकार बनाम प्रकृति सिद्धांत विपरीत, आज की व्यवस्था में:-
[(01) बेटा + (01) बेटी + {(00१*१)= (01)(दिन)–(रात)}] :- पद, प्रधान, अधिकार सब मानव निर्मित सरकार के नियमों से चलते हैं:-
* जबकि:- प्रकृति ब्रह्मचर्य + प्रेम + संतुलन सिध्दांत बिज़ संग्रहण पराग कप्तान कण पर चलता है…
* प्राकृतिक सिद्धांत पर सम्भोग पद नही क्षण भर कि जोश होष प्रक्रिया प्रधान होती है…
* उपभोक्ता नही, नयन सुख सहभागी, आंधे अंधे कॉपीकेट को प्रसन्न किन्तु अभागा होते हैं…
* उद्देश्य विहिन सम्भोग और आंतरिक असंतुष्टी के कारण जनम लेने वाला सुबह शाम पंचक काल चक्र में फंसा हुआ वंशज की सर्वमान्य तौर पे वृद्धि की विवश होती होता है---
* रॉयल्टी रिटर्न इनकम टैक्स पैड सिद्धांत पर अधर आधार पर आधारित सम्भोग खुली आंखो 04नयन मिलन पर उद्वेश्य (02)कर पर जनम लिए पुत्र पुत्रि सर्व गुण सम्पन्न समृद्ध साम्राज्य का उत्तराधिकार , सभी चक्र भेदक निडर बलवान लीडर आत्मशक्तिशाली आत्मज्ञानी धनुषधारी नाभि पर क्षण मे टिक्क सफ़लता पा कर सफ़ल योगदान करता होता है---
* बेरोज़गारी और इको–ईको सिस्टम समाधान करता है:-
* ???? बेरोज़गारी का मूल कारण:- प्रकृति से कटे फटे नोट की तरह कृत्रिम उपभोग मॉडल(सम्भोग) :- तृष्णा अपूर्ण सम्भोग :- आधारित उत्पादन उद्योगपति, धरम करम अध्यात्म औशधि जग़त, राजनीति, मन्दिर मस्जिद, गिरजाघर, प्रेयर हाउस, चर्च, श्मशान प्रेयर पवित्र कब्रस्थान …
* ???? समाधान:- इको– ईको सिस्टम आधारित उपभोक्ता पद्धति प्रो शुमर:- आवश्यकता अनुसार उपभोग :-
* बीज–बिज़–उत्पादन–वितरण मे सहभागिता…
* ब्रह्मचर्य = ऊर्जा संरक्षण…
* प्रेम = सामाजिक संतुलन…
* सम्भोग= विकृति नहीं प्रकृति सन्तुलन सिध्दांत बिज़ बीज संग्रहण परिपक्व बनकर सफ़ल पकका फल है…
* निष्कर्ष {(सार) || (रस ₹)} :-
ब्रह्मांड शिव–शक्ति के संतुलित कोणों से चलता है
मानव जब प्रकृति प्रेम और ब्रह्मचर्य से हटता है, तब बेरोज़गारी, असंतुलन और संकट जन्म लेते हैं…
जीवन रस: उपभोक्ता चेतना बदलने मे है…
???? प्रकृति के अनुसार जीवन = कल्याण…
???? मानव निर्मित भोग व्यवस्था = विकार---
* 01. 018–027 वर्ष : भारत का स्वर्ण अवसर :- भारत में 018 वर्ष से 027 वर्ष की आयु के बीच का प्रत्येक इनसान…
* स्वयं ₹05% e-GST आधारित प्रोस्यूमर मार्ग अपनाकर , आर्थिक रूप से स्वयं स्वतंत्र है…
* तो वह :—
* ✔️ अपने जीवन की आर्थिक आज़ादी का सर्जक है…
* ✔️ देश की आर्थिक आज़ादी में प्रत्यक्ष सहयोगी है…
* ✔️ नौकरी खोजने वाला नहीं, अवसर बांटने वाला नागरिक है…
* ✔️ प्रकृति–प्रेम, संतुलन और ब्रह्मचर्य सिद्धांत का अनुसरण कर्ता है…
* ???? ऐसा युवा सफ़ल जीवन का नैसर्गिक अधिकारी है---
* प्रोस्यूमर मार्ग क्या है...? (सरल अर्थ)
* उपभोक्ता + शरीर उद्योग संचालक = प्रोस्यूमर
* आवश्यकता अनुसार उपभोग करता…
* इमानदारी से शरीर की आवश्यकता एवं पूर्ति, सेवा और अनुभव विशेषज्ञ…
* ₹05% e-GST पर पारदर्शी योगदान …
* डिजिटल माध्यम से सीधा लेन–देन…
* ➡️ यही आत्मनिर्भर युवा – आत्मनिर्भर भारत का व्यावहारिक मार्गदर्शक है…---
* क्यो 018–027 वर्ष निर्णायक हैं…?
* यह आयु ऊर्जा, सीख और प्रयोग की है…
* इसी समय लिए गए निर्णय पूरे जीवन की दिशा तय करते हैं…
* यदि युवा इस काल में प्रोस्यूमर चेतना को अपना ले — तो बेरोज़गारी स्वयं समाप्त हो जाती है---
* सार–वाक्य (स्लोगन रूप में)
• -> “018–027 वर्ष कि उमर मे ख़ुद कमाने और इन्वेस्टमेंट का संतुलन सीख लेता है, वह जिवन और राष्ट्र निर्माण के क्षेत्र मे सफ़ल हो जाता है…”