मनू||नु स्मृति स्मरण
विषय : मनू||नु स्मृति स्मरण
FAIL फ़ैल || PAaSs पास
* अंक अणक १1 से १०10 कुल योग ५५ (पचपन) है…
* अक्षरो का योग ५२{बावन} है... जिसमें स्वर अ से अ: तक तरह १३ {तेरह} है; और व्यंजन ३९ {ऊंचालीस} है…
* इंग्लिश कैपिटल {A²_Z} (छब्बीस) है…
* जिसमें A२U सिर्फ़ 5(पांच) है बाकी B२Z; (इक्कीस) 21 है…
* (५५+१३+३९+52]= १५९ अंक योग +बावन +बावन अक्षर+ पचपन = १५९ योग अंक + अक्षर का योग + दो आंख और धरती पर दो पाव का खेल से सपने को देखते हुए चलने से सफलता और बिना देखे चलने से विफलता मिलती है…
* पद की कुर्सी के चार पांच पांव वाली होती हैं …
* बिना अंक वाला पद पर विराजमान होना चाहते हैं पर बिना पांव वाली कुर्सी पर कोइ बैठना नहीं चाहते हैं…
* पहले शून्य को नज़र अंदाज करने के कारण संसार भ्रमण कर रहा है…
* किन्तु भ्रम में भटक कर, कर भुगतान करता है…
विषय: FAIL फ़ैल || PAaSs पास – जीवन का अंक, अक्षर और संतुलन का ब्रह्माण्डीय सिद्धांत
* सफ़लता (PASS) और असफलता (FAIL) दोनो ही जीवन के दो पहलू हैं→जैसे दिन और रात, प्रकाश और अंधकार, या ज्ञान और भ्रम…।
* अंक (संख्या) और अक्षर (भाषा) इन दोनो के बीच सणतुलन का माध्यम है…।
* प्राणवान शरीर {इनसान और अन्य जीवन धारी} सभी के देह (तन,मन,धन, बुद्धि, समय, संस्कार लड़का लड़की जनम के पहले 01शून्य शुन्य एक स्वर है)
* शरीर के अन्दर बाहर दोनो शून्य शुन्य से शुरू हो कर ले दे कर शून्य एक ज़मीन मे गन्ना की आंख बन जाता है---
* शरीर चटाई की तरह ०५२+०५२ अंक और अक्षर का; स्क्वायर खण्डों का; योग है और ०५२*०५२ का गुणन फ़ल फ़सल की तरह आलिंगन कर रहे है…
* इसी परकार शरीर एक "अनार" कि तरह है जिसके अन्दर के बिज़ की। गिनती होती है--- रस पीते हैं, बीज खाते हैं और बिज़ की बुआई की जाती है--- फ़िर हक़ीक़त मे फ़िर वही अनार पाते हैं…यह चक्कर लगाते हुए जीवाणु यू टर्न ले उड़ जाते है---
* यही U का नाम ड्रामा है जिसे देखते सुनते चलते फ़िरते स्वछंद आनन्द प्रमोद कुमारामात्य को आर्थिक आजादी प्राप्त करने केलिए भी प्रेरणा मिली हुई थी है और इसके बाद भी रहेगी…
* जब मनु ने ०१ से ०१० तक की गिनती देखी मर्म को समझा तो सीखने सिखाने का खेल शुरू किया गया और ०५ की १५(०५तत्व+ ०५कर्मेंद्रियां +०५कर्मेंद्रियां योग १५ + १२ शक्ति शक्ती) बना दिया गया और यहीं से विकृति मुझे साफ़ साफ शुरू कर मे साफ़ देख पा रहा हू…
* मनु मनू ने अपने नाम से ब्रह्मांडीय सृजन ०१ - ०५ ; ०७, ०८, ०९ की गणना का रहस्य पाया और योग ५५, जो न केवल संख्या है, बल्कि एक संकेत है कि हर पूर्णता दो अर्धों के मिलन से बनती है…। जिसमें से सामने आई शून्य को शुन्य मानकर छोड़ दिया गया है…
* मानव जीवन शरीर समाज राज्य देश विदेश भ्रमण सबकुछ उद्योग संचालक बन चुके हैं सिर्फ़ प्रकृति सिद्धांत पर कर भुगतान करने और पाने वाले इमानदार कृषक कृष्ण समान होता "को" किनारे कीनारे चरवाह बना "कर" नदी नाला तालाब और समुद्र को सूखने नही देते है---
* अब हम शुरू से शून्य शुन्य चार०४ मे से ०९९००००१ अन्न कण अनन्त फ़ल फूल पत्ती तना दाना बिज़ से संचालित होते हैं…
* अक्षरो की ०५२ संख्या बताती है कि भाषा वह शक्ति है जो सृष्टि को अर्थ देती है → जहा ०१३ स्वर जीवन कि स्वांस है और ०३९ व्यंजन उसके प्राणवायु…।
* इसी प्रकार, अंग्रेज़ी के 026 अक्षर मे 05५ स्वर (A, E, I, O, U) ज्ञान के पांच तत्व हैं —> और शेष ([021]{०२१}) व्यंजन कर्म और क्रिया का प्रतिनिधित्व करते हैं…।
* जब अंक (०५५) + स्वर (०१३) + व्यंजन (०३९) + अक्षर (०५२) का योग [(०)⁰⁴{१५९}] होता है, तो यह सणखया केवल गणित नही, बल्कि जीवन का सूत्र बन जाती है —>
* “देखकर चलो तो सफलता,
बिना देखे दौड़ो तो विफलता।” हर क्षेत्र पर ०१समान रूप लागू होता है---
* कुर्सी चार या पाँच पांवों पर टिकती है; जिस पर परीक्षा पास होने के बाद बैठा जाता —
* जीवन मे पद (प्रतिदिन) की कुर्सी भी धैर्य, श्रम, विवेक, संयम और विश्वास पर टिकती हुई है…।
* जो बिना पांव की कुर्सी पर बैठना चाहता है, वह केवल हवा मे महल बना सम्पूरण इमानदार ज़मीन का ख्वाबों में आनन्द लेता है; फ़िर वही हक़ीक़त मे भी स्वयंम आनन्द विभोर हो कर दाता शून्य एक बनता है---…।
* आज का आधुनिक समाज भी उसी भ्रम मे है —
* वह शून्य (0) को छोटा समझता है→ जबकि वही अस्तित्व की जड़ है…।
* जब तक मनुष्य “शून्य” का सम्मान नही करेगा, तब तक वह कर (Tax) और कर्ज़ (Debt) के भ्रम मे ही संसार का चक्कर लगाता रहेगा…।
सार :-> जीवन एक गणित और भाषा का अद्भुत संगम है…।
* जो अंक और अक्षर का संतुलन समझ गया…,
* ००५०० का जानकार हि | ही PASS कर लेता है…->
* और जो केवल दौड़ा, बिना अर्थ मूल्य तात्पर्य परिवर्तन विशेषज्ञ सारथि लक्षय के—> वह FAIL मे जीवन लीला समाप्त कर अग्नि या भूमि या जल वायु आकाश पाताल में समा गया…।
* “सफ़ल वही, जो शून्य को समझे ; समझाए — और सबमे पूर्णता खोजे कर 05कर{शून्य शुन्य नौ कर को संयुक्त राष्ट्र उद्धार कर्ता युग} देखे दिखाए …।”
* स्वामी वेदमनु|नू ने शून्य '0'0' की ख़ोज कर ब्रह्माण्ड समाया गया , विलीन हो गया …
* और स्वार्थी ब्राह्मण जो शून्य एक शुन्य दो आंख वाला स्वयं को नही पहचानता था (पुजारी पड़ा पंडित बन किसानो से फ्री राशन पानी ले प्राणि से प्राणी कि हत्या कर स्वयम वृद्धि करते आ रहे हैं…)
* लोग औरत को उपभोग कि वस्तु समझने लगे थे…
* आज जाती जाति मे बांटकर देश आर्थिक स्वतंत्रता से गुलामी 09अरब कि ओर तेज गति से अग्रसर हो रहा है---
* आर्थिक गुलामी समय की कमी स्वास्थ्य रोजगार सुरक्षा नौकरी स्व रोज़गार बेरोज़गारी शरीर से दूदुर लेके घर से दूर करता है…
* इमानदार को खत्म करने केलिए आज नेता अनजाने ऐसा कदम उठा ले रहा जो मानव फ़िलासफी जीवन के लिए थी आज अभिशाप बन कर रह गया है…
* सामने के सभी शून्य एक को हटा कर वसूला जा रहा है…
* पर सबसे ज्यादा संख्या को अपने पीछे रखने और स्वयं को सबसे आगे शुन्य एक स्वयम कहने मे सफ़ल हो कर का राज़ छिपाया जाते आ रहा है ---
और अधिक गति की जानकारी केलिए संपर्क सूत्र : 09644677750 ; 09425554092 ;
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