बाहर GST गेस्ट है — अन्दर GOD’s गोद है
विषय:- “बाहर GST गेस्ट है — अन्दर GOD’s गोद है”
संक्षिप् विचार:- जीवन के दो स्तर है :- बाहरी संसार और अंतःकरण…
* बाहरी संसार GST उपहार है :— गणना, कर, मूल्य, लेन-देन और नियमों से भरा हुआ माया जाल है…
• हर चीज़ का हिसाब है :- लाभ-हानि, लेने का रिवाज़ है ; देने मे भाई भतीजा वाद योग्य ; अयोग्य माप दण्ड नही ; बल्कि उपहार है…
* यह क्षेत्र गेस्ट (अतिथि) का है :- अस्थायी, आता और चला जाता है ; क्योंकि मलमूत्र द्वार मे कब्जियत है…
* भीतरि संसार मे GOD’s की गोद है :—> निर्मल, निस्वार्थ, शांत और हक़ीक़त है; बोलिए क्या चाहिए…
* अन्दर कर बिज़ है ; कोई व्यापार नहीं :—> प्रेम, विश्वास और समर्पण लड़का लड़की जनम समय शून्य एक बार फ़िर हक़ीक़त मे भगवान है…
* भीतर उतरना नही है, वह परमात्मा की 01नाभि गोद में विश्राम करना सीखना है…
निष्कर्ष:-> बाहरी दुनिया को समझो —> पर उसमें फँसना मत 001 दो आंख वाला त्रिकाल दर्शी हो …
* भीतर गोद में 01पल रहना है :-> इमानदार का सच्चा सुख, शांति और समृद्धि की उत्पति है…
सूत्र:-> “GST मे गणना है, GOD'S गोद मे गुणगान मुल सफ़लता फ़ल है” …
* “बाहर कर व्यवस्था सरकार की 02एक दो हाथ ज़मीन है ; भीतर करुणा प्यार स्वीकृति प्रकृति प्रेम पद्धति Ñatural व्यवस्था है।”…
* विषय:-> “इको सिस्टम ; माया यम को चुप कराती है”
संक्षिप्त विचार:-> इको सिस्टम (प्रकृति का संतुलन) केवल पेड़-पौधों या जल-वायु का तंत्र नहीं है…;
यह जीवन का मौन संगीत है :—> सब कुछ अपने नियत स्थान पर, अपने धरम करम स्वर मे स्थित है…
जब यह संतुलन जागृत रहता है :—> माया (भ्रम, लालच, अहंकार) स्वतः शांत मौन धारण करने कराने लग जाती है ; और यम (भय, मृत्यु, विनाश) मौन स्वीकृति प्रकृति नव जीवन प्रदान करने लग जाती है…
* क्योंकि जहाँ प्रकृति का नियम चलता है ; वहाँ मनुष्य का ‘अहं’ नियम स्वत: निष्क्रिय हो जाता है; और वहाँ जीवन का प्रवाह आत्मा के आदेश से चलता है…,
* इच्छाए वरदान स्वरूप दीप प्रज्वलित कर प्रकृति संकेत देती है---
* सार:-> “जब इको सिस्टम जाग्रत होता है, तब माया मौन होती है और यम निष्क्रिय”…
* “प्रकृति प्रेम हि स्वत:अनुशासन मे परमात्मा की उपस्थिति दर्ज होती है।”…
* संक्षेप सूत्र:-> स्व संतुलन ही सुरक्षा जो नाम मे है, प्रकृति प्रेम ही परम गुरु - शिष्य है…
विषय:-> “जो बोले — ‘कुछ नहीं चाहिए’, वह अपने नाम का राज़ नहीं जानता है; मैं बताता हूँ उसके बारे में…”
व्याख्या:-> जब कोई मनुष्य कहता है : “मुझे कुछ नहीं चाहिए”, तो सुनने में यह वाक्य बहुत महान, संत-जैसा लगता है ; परंतु यदि भीतर देखा जाए, तो यह वाक्य अधूरी समझ से उपजा होता है ; वास्तव में ‘कुछ नहीं चाहिए’ कहने वाला व्यक्ति अपने नाम का अर्थ, अस्तित्व का रहस्य और जीवन का उद्देश्य नहीं जानता है ---
01. “नाम” — केवल पहचान नही, एक ऊर्जा है…
* हर व्यक्ति का नाम उसकी तरंग (vibration), संस्कार और कर्तव्य का सूक्ष्म सूत्र है…
* नाम मे नाद (ध्वनि) और नाद मे परम अर्थ छिपा है ; जो अपने नाम का अर्थ जानता है, वह जानता है :-> “मै क्यो आया हूँ, और मुझे क्या करना है”…
* इसलिए जो कहता है “मुझे कुछ नही चाहिए”, वह अपने नाम के उस दिव्य उद्देश्य से अंजान है, जिसे पूरा करने के लिए वह जनम समय शून्य शुन्य एक है…।---
02. “कुछ नही चाहिए” = कर्म से पलायन ; प्रकृति मे कोई भी तत्व निष्क्रिय नही होता है …
* हवा चलती है, सूरज जलता है, नदियाँ बहती हैं, धरती गति के कारण समय पर देती है ; जो कहता है “कुछ नही चाहिए”, वह इस प्राकृतिक कर्म-प्रवाह से अलग होता है…
•> चाहना ही जीवन की धड़कन है ;
बिना चाह के चेतना ठहर जाती है,
और ठहराव ही माया का प्रारंभ है …।---
03. “चाह” को समझना = ईश्वर की दिशा को पहचानना ; सच्ची चाह भोग की नही, योग चाबी भट्टी होती है ; वह चाह जो “मै” से “हम” तक ले जाए :-> वही दिव्यता की चाहत है ; अपने नाम का राज़ जान लेता है,
वह कहता है :—> “मुझे वही चाहिए जो मेरे नाम के अर्थ के अनुरूप है।”
“मै वही करू जो मेरे अस्तित्व की सच्ची दिशा है”…।---
04. निष्कर्ष :-> जो कहता है “कुछ नहीं चाहिए”, वह ईश्वर द्वारा दिए गए अपने नाम के कार्य को अनजाने मे रोकता है ; पर जो अपने नाम का रहस्य जान लेता है, वह समझ जाता है :—> “मेरा नाम मेरा काम है”; “मेरा नाम ही एक शुन्य शब्द करम धरम कारण विक्रम विनाशक है”…|---
सूत्र रूप :-> “नाम जानो — तो काम जागे, काम जागे — तो ईश्वर आगे से 03शूशुन्य दोकर से भाग्य बना जाए"---