उद्योग शब्द हर किसी की जननी है
*उद्योग शब्द हर किसी कि जननी है*
• ०१. प्रकृति :•: समानांतर इको-व्यवस्था (पर्यावरण)…
• प्रकृति कोई उद्योग नहीं है, फिर भी हर उद्योग की जननी है…
• प्रकृति बिना बिल सेवा देती है—हवा, पानी, मिट्टी, ऊर्जा, आकाश पाताल समय गति…
• इसका अपना संतुलन है: ऋतु, चक्र, पुनर्चक्रण…
• मनुष्य ने जबसे “उपयोग” से “उपभोग” में बदला, तब संकट शुरू हुआ है…
• ???? प्रकृति समानांतर इसलिए है क्योंकि यह मानव-प्रणाली के बिना भी चलती है, पर मानव इसके बिना चल फ़िर नहीं सकता है…
• ०२. अध्यात्म :•: आस्था + प्रसाद उद्योग…
• अध्यात्म मूलत आत्म-अनुशासन मुखवंशावली केन्द्र बिन्दु घुमावदार कर शिष्य शिक्षक भक्त लीडर उम्मीदवार प्रोसुमर अर्थ संग्रहण केन्द्र है…
• समय के साथ यह आस्था आधारित कर लेन-देन के बिना वंशज दिखाई देता है…
• मंदिर, तीर्थ, चढ़ावा, प्रसाद—सब आर्थिक प्रवाह बने हुए हैं...
• ???? जब साधना कम और प्रदर्शन अधिक होता है तब अध्यात्म भी उद्योग बना हुआ है…
• ०३. कृषि :•: बीज– फ़सल उद्योग…
• यह एकमात्र प्राकृतिक उद्योग है...
• बीज बिज़ = विचार, खेत = कर्मभूमि, फसल = परिणाम, उर्जा केन्द्र नाभि संतुलित जीवन-व्यवस्था सक्रिय हिस्सेदार साथी कर दाता है…
• पहले किसान स्वायत्त था, अब बाजार दलाल पर निर्भर पोषण के नाम पर शौषण शासन दर निश्चित कर रहा है …
• ???? कृषि जब तक जीवन-आधारित थी, पवित्र थी; जबसे मुनाफा-आधारित हुई, तब से संकट कीमत बढ़ते ही जा रही है…
• ०४. शासन :•: कर उद्योग …
• शासन का मूल उद्देश्य था—सुरक्षा और न्याय प्रदान करना …
• आज इसका प्रमुख इंजन है कर संग्रह…
• कर बिना पारदर्शिता के प्राप्त हो तो वह सेवा नहीं, शोषण और घोषणा मात्र छलावा पत्र पदधारी का इनकम का जरिया है…
• ???? शासन तब धर्म है जब कर का प्रतिफल नागरिक चखे देखे दिखाए और महशूस करे…
• ०५. प्रशासन :•: नौकरी उद्योग...
• प्रशासन व्यवस्था को चलाने का हुक़ूमत कर एकत्रित करने वाला साधन है…
• लेकिन यह सेवा से सुरक्षित नौकरी का उद्योग पेंशन परेशान करने का अधिकार बन गया…
• नियम-पालन बढ़ा, समाधान घटा लापरवाही चरम सीमा पर निर्भरता और दायित्व कम कर खाना पूरती कर रहा है…
• ???? जब कुर्सी उद्देश्य बन जाए, तब प्रशासन जड़ हो कर समय संस्करण राज़योग नाम राज़ पद पर कर है…
• ०६. ज्ञान :•: डिग्री + भ्रम उद्योग…
• ज्ञान का अर्थ था—समझ, सुझ बूझ पहरेदार प्राणि|णी रोग निदान समाधान करता कर्ता ख़ुद…
• आज ज्ञान = सर्टिफिकेट, डिग्रीधारी सर्वमान्य,
डिग्री बढ़ी, विवेक घटा, धन पद बड़ा धरम बड़ा करम छोटा मध्यम बड़ा सफ़ल असफल उद्योग है…
• ???? जब प्रश्न पूछना बंद हो जाए और रट्टा बढ़ जाए, तो ज्ञान भ्रम पैदा करता है और दोहराव उद्योग निर्भर खाद्यान्न घनत्व प्रभावित करता है…
• ०७. विज्ञान :•: वस्तु उद्योग ...
• विज्ञान खोज करता था, अब उत्पादन व्यवहार उद्योग धन संपत्ति एकत्रित दोनो हाथो से रात दिन हर इन्सान समय का गुलाम नौकरी करता है…
• सुविधा बढ़ी, निर्भरता भी बढ़ी, बुद्धि समय संस्कार स्वास्थ्य सुरक्षा कवच दवाई उद्योग संचालक निर्भर WHO अनुशंसा पर निर्भर मान्यता प्राप्त केमिकल, भूमि कोषाध्यक्ष ख़ज़ाना बेकार कर दिया गया है...
• मानव उपकरणों का स्वामी नहीं, उपभोक्ता कर मात्र खपत करता बाण तीर्थ स्थल प्राणवान रह गया है...
• ???? विज्ञान बिना विवेक के हो तो विकास नहीं, विनाश करने वाला प्राणि आत्मघाती बनकर योगदान करता है…
• ०८. शिक्षा :•: दोहराव उद्योग …
• शिक्षा का लक्ष्य था—सोचना सिखाना साकार रूप देना भुमि संरक्षण अन्न उत्पादन…
• अब यह परीक्षा-उत्तीर्ण करने की मशीन डिग्री धारी अनुभव विहिन बेरोज़गार लड़का लड़की रोज़गार दफ्तर निर्भर अभ्यर्थी है…
• वही पाठ, वही ढांचा, पीढ़ी दर पीढ़ी, अंक शब्द मुल्य निर्धारण निर्णय बिना मेहनत अनुसरण करता निर्मम धर्म इंतज़ार सुरज ढलने का इंतज़ार ख़त्म समय निर्भर करता है…
• ???? जो शिक्षा प्रश्न नहीं जगाए, वह प्रशिक्षण भर रह जाती है, और ग़ुलाम पैदा करता है…
• ०९. परिवार-प्राण :•: वंश-वृद्धि उद्योग…
• परिवार संस्कार और वृद्धि का केंद्र होता था…
• अब यह जैविक निरंतरता तक सिमट कर रह गया है कोई रह गया और इको वातावरण खत्म हो रहा है…
• भावनात्मक, नैतिक पोषण घटा और आर्थिक स्थिति अकर्म स्वमेव घटित होती जा रही है…
• घर की मंज़िल ऊंची और अच्छी इनकम स्रोत उद्योग निर्भर होते जा रही है…
• ???? संतान संख्या और संस्कार से समाज बनता था आज संख्या एक प्राणि रोगि सरकार निरोगी दवाई उद्योग शरीर धारी है…
• १०. राजनीति :•: दल उद्योग…
• राजनीति मूलतः लोकसेवा थी…
• अब यह सत्ता-प्राप्ति और संरक्षण का उद्योग है...
• विचार पीछे, दल आगे कुरसी सबसे आगे बाकि सब पीछे शुन्य शून्य एक ज़मीन का टुकड़ा हिस्सेदार बेकार हकदार किसान मात्र है...
• ???? जब राजनीति नीति नहीं, गणित बन जाए—लोकतंत्र कमजोर मात्र दिखावा होता है…
• ???? समग्र निष्कर्ष :•:
• प्रकृति के अलावा मानव ने हर व्यवस्था को उद्योग बना दिया है...
• फ़ि|फीर उसी उद्योग का गुलाम बनकर रह गया है और कर भुगतान हर पल कर रहा है…
???? 001 अध्यात्म : समय, श्रम और परिणाम का विज्ञान…
• लोगों द्वारा सुझाए गए कॉन्सेप्ट पर आधारित कार्य में यह सामान्य धारणा रही है कि…
50 वर्षों के पारंपरिक नौकरी आरामगाहन अनुभव का परिणाम पाने में लम्बा समय लगता है…
• परंतु विज्ञान के सहयोग से वही परिणाम 05 वर्षों में प्राप्त किए जाना संभव हैं— इसे मैंने व्यवहार में सिद्ध किया, यद्यपि यह मेरी व्यक्तिगत खोज नहीं रही थी…
• लेकिन यहीं से यात्रा समाप्त नहीं हुई… यहीं से नई दिशा प्रारम्भ हुई है…
• ???? 001 अध्यात्म का प्रयोगात्मक सत्य
आज मेरी खोज यह दर्शाती है कि—
• 001 अध्यात्म के सहारे…
• सौ सदियों के श्रम का परिणाम मात्र 001 वर्ष में पाया जा सकता है…
• यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन + इनकम + रॉयल्टी का प्राकृतिक ऑटोमेशन मॉडल है…
• ???? प्रोशुमर जीवन शैली : जहाँ प्रकृति शासन करती है…
• जब मनुष्य उपभोक्ता नहीं, प्रोशुमर बनता है…
• प्रकृति से टकराता नहीं, प्रकृति-प्रेम करती है,
लालसा नहीं, संतुलन में जिवन जीता है…
• तब—
• ???? परिणाम के लिए भागदौड़ नहीं करनी पड़ती…
• ???? परिणाम स्वमेव दिखाई देने लगते हैं…
• ???? प्रकृति स्वयं वितरण-प्रणाली बनती है…
• शासन (System) स्वतः संचालित होता है…
• ????️ नज़ारा बदलते ही नतीजे बदलते हैं…
• प्रतिदिन :•: प्राकृतिक सौंदर्य, स्वस्थ दिनचर्या, सचेत कर्म और शांत मन— इनके साथ किया गया कार्य बिना तनाव, बिना संघर्ष, बिना छल
मनोनुकूल इनकम वृक्ष फलते हुए दिखाई देते है…
• ✨ निष्कर्ष :•:
• जहाँ विज्ञान समय घटाता है, • वहाँ अध्यात्म समय को निरर्थक कर देता है…
• यही 001 अध्यात्म का रहस्य है— कम समय, कम श्रम, अधिक परिणाम और वह भी स्वस्थ, नैतिक और स्वाभाविक परिणाम स्वमेव प्रकृति ऑटोमैटिक पहुंचा कर देता है…