जीवन-चक्र, प्रवृत्ति और मानव-धर्म : एक अदृश्य तुलना
जीवन-चक्र, प्रवृत्ति और मानव-धर्म : एक अदृश्य तुलना
* सृष्टि में हर प्राणी अपने स्वभाव, प्रवृत्ति और कर्तव्य के आधार पर जीवन जीता है। किसी के पांव नहीं, किसी के दो, किसी के छह — पर सबकी यात्रा एक ही धुरी पर घूमती है: जीवन, भोजन, भय, सम्भोग और वंश-वृद्धि…
* इस विराट व्यवस्था में एक स्थान है जहाँ केवल शरीर नहीं, चेतना का विकास ही असली पहचान बनता है :—>
* प्राण ऊर्जा 01समान उर्जा प्रवाहित होती है ; किन्तु मानव जीवण प्राणि प्राणी का भेद सम्भोग के माध्यम पर प्रकृति दिखाती है; सिखाती नहीं है…।…
पांव विहीन — सर्प का भय और विष का विज्ञान :-> पांव रहित सर्प न माँ को पहचानता, न पिता को…।…
* दांतों में भरा विष, धरती मा बाप दोनों और बच्चे को डराये पर सपेरा बिन बजाए नाग भी डांस करे विधायक राज़ राज्य में मौज मस्ती करते नजर आए फिर भी कोई बोल नहीं पाए क्योंकि गुंडा राज में कुर्सी चार पांव पांच साल राज करे छठे बरस फ़िर रंग बदलकर वोट मांगे बेझिझक घर घर पैसा लुटाए कर्क रेखा नाच नचाए…।…
• जीवन का मूल मंत्र — सुरक्षा और आक्रमण, यही उसका धर्म है। न रिश्ते, न संस्कार, सिर्फ अस्तित्व की लड़ाई लड़का लड़की मे एक समान होती है…
* मानव बच्चे बच्ची की चाह नहि फ़िर भी सम्भोग करते और अन्याश्यक वीर्य नहीं फ़िर भी जोश मे होश खो आंख बन्द "कर" लेते देते हैं:और प्रकृति विरुद्ध करम करते जाए ; पकड़े गए जेल जाए निर्दोष लड़की पापी कुलटा कहलाए …।…
* कम उम्र ब्याही राज़ गुरु की दासी बन ब्राह्मण की सेविका दास पुत्र सेवक और पुत्री सेविका गुरु पुत्र दासी बनी पर किसी की लुगाई नहीं बनपाई और जंगल राज़ सांध्य हर रोज़ नया मर्द भोग करे ; कोड़ा चलाए मालकिन बण चलाए राजा पर रोब हीरा मोती सिंह शेर सिंह कहलाए…
दो पांव — पक्षियों का मुक्त संसार;:-> पक्षी नर–मादा बिना भाषा के भी प्रेम, भोजन और वंश-वृद्धि का संतुलन बनाए रखते हैं। एक ही भोजन, एक ही उड़ान, एक सा व्यवहार — दिन में जीवन, रात में प्रवृत्ति। प्रकृति ने इन्हें आकाश दिया, पर विवेक और मर्यादा नहीं दी…।…
* दो पांव के बल पर सम्भोग कर आदान प्रदान से वंश वृद्धि करना स्वाभाविक प्राकृतिक प्रक्रिया से अंडे बच्चे बच्ची संतुलन प्रकृति सिद्धांत निर्भर है …
* निरोध या नसबंदी की आवश्यकता नहीं होती है…
छह पांव — प्राणि-विश्व की अनुशासनशाला :-> छह पांव के सहारे सम्भोग करने वाले जीव न विद्यालय जाते, न भाषा सीखते; पर समय पर संसर्ग, समय पर जन्म, और समय पर मृत्यु का राज़ निभाते हैं…।…
* प्रकृति के नियमों को बिना पढ़े, बिना गुरू के —→ वे जीवन का गणित हल कर लेते हैं…।…
* मनुष्य पढ़कर भी अक्सर ये मूलभूत गणित नहीं समझ पाया है कि 9माह , पांच तत्व, पांच ज्ञानेंद्रियां और पांच कर्मेंद्रियां सभी का योग पंद्रह है या और कुछ …
* इसका मुख्य कारण है भाषाई दुनिया मे सर्व प्रथम एक लाइन खड़ी लकीर | लड़की और दूसरी खड़ी लकीर लड़का केलिए ज़मीन पर खींची गई…
* लड़का लड़की नर मादा स्त्री पुरुष के सोने उड़ाने बैठने निंदराशन अनुसार चिन्ह -|+| x | ÷ | % π√§∆ (){}[]° •|• ! ¡ | ¡ ! कि उत्पति पर निर्भर निर्भय होकर रह गए थे और हैं…
* क्योंकि प्राथमिक अक्षर ज्ञान से लेकर PhD तक किसी ने भी गाइड से गाइड ने और नहि स्वयं गाइड ने खुद से कभी भी यह नहीं पूछे हैं कि कैपिटल अल्फा बीटा गामा और ॐ मे किरण है …
* छोटी बड़ी अंक स्वर व्यंजन में स्पष्ट नहीं है तो पद पैसा इनकम छोटा बड़ा इंसान कहां से उत्पन्न होकर आए हैं…
* GOD थ्योरी में कोई छोटे बड़े नहीं हैं किन्तु MEN मेड थ्योरी में हर क्षेत्र यहां तक दिन रात में भी अंतर है जबकि यूनिवर्सल थ्योरी में रात दिन होता ही नहीं है सिर्फ़ पृथ्वी की गति पर सबकुछ निर्भर है…
* पृथ्वी की गति सिर्फ सूर्य की प्रकाश की स्पीड के कारण धरती अपनी धूरी पर लगातार तीव्र गति कि स्थिति में भी अनन्त में भी जीवन यानि प्राण ऊर्जा एक समान सम्भोग से प्राण प्रजनन सम्पन्न होते चले आ रहा है और चलते रहेगा …
खरगोश:—> 015 माह का जीवन; 012माह ; बारह सम्भोग_ 024- 042ÇR… संतानों का चक्र:-> तेज़ जीवन, सम्भोग मृत्यू का कारण…
* यही उनके जीवन का सूत्र आज भी है ; क्यों जन्म लिया, क्या किया, कब किया, कैसे किया, कहां कर चुकाया, क्या खाया पिया, और वाहन की चमकती लाइट कि रोशनी में चक्के में दब कर मर गया या रहा गिर के हाथ पकड़ा गया और मांसाहारी प्राणी प्राणि का व्यंजन बन आम जीवन कि कहानी समाप्त स्वर्गवासी निवासी बनकर रह गया प्राणी प्राणि का भेद इन्सान भी सम्भोग का खेल समझ ही नहीं पाया है…।…
* उत्पादन करते अन्न, पर जन्म का राज़ कोई नहीं जान पाया और बिना पाया…
* प्रकृति का खेल निराला सम्भोग ही नहीं सिर्फ़ गति को वरदान है; दिशा सूझबूझ गुरु के ज़ुबानी है कहानी है…।…
012 वर्ष बाद सम्भोग :-> शेर का जंगल-राज़ :-> जंगल का सम्राट होने के बावजूद शेर भी देरी से परिपक्व होता है…
* राजा शेर इंतज़ार नहीं करना नही चाहता इसीलिए अपने अपरिपक्व बच्चे को मादा शेरनी की नजरों से ओझल होते ही अपने ही बच्चे को मार कर ख़ून पी जाता है; मादा कुछ समय बच्चे के ग़म से बाहर हो प्रकृति सुगंध फैलाने में मदद कर नर शेर को स्वत: मुस्कुराकर आकर्षित कर पुनः गर्म गर्भ वीर्य विषरजन से संतुलन प्रकृति सिद्धांत प्रजनन सम्पन्न कराती है…
* धरती पर लेट कर ही सम्भोग करता है — शक्ति है, रौद्रता, पर आत्मसंयम और मर्यादा का धागा यानि जबरन सम्भोग दिन में भी करने मे सफ़ल; मनुष्य की तरह डॉमिनेट कर सिंहासन हासिल करते हैं…
* इन्साज़न ने कुर्सी बनाई 05साल बैठने केलिए पर विरोधी तैयार है पलपल पलटवार कर गिराने और "कर" खाने के लिए …
* मनुष्य के हंटर और चार पाइ कुर्सी के आगे और जंगल का शेर और घर की शेरनी महिला के आगे पीछे घूमता नेता है , — यह प्रकृति का विचित्र संतुलन है…
और फिर… इनसान!
* मानव संस्कार, विवाह, मर्यादा और सामाजिक नियमों के साथ दिन–रात किसी भी समय सम्भोग करता फ़िर भी मन खाली झोली भारी चिरयौवन की गोली खा खा लेना देना बन्द हो जाता है फ़िर भी आंख बंद कर, मोह का सागर, आंख खोल दे तो बुद्धि का दीपक बन सम्पूरण जग जगमग करने निकल पड़े हैं…।
* अधिकतर इंसान पढ़ाई, नौकरी, पैसा और ‘चूहा-रेस’ में ऐसे फँसते हैं कि पूरी उमर नौकर–मालिक बनकर जाने-अनजाने जिंदगी खत्म करते हैं…
* धन, पद, वंश — सब होते हुए भी धरती माँ का वीर पुत्र लाल बहादुर शास्त्री जैसा एक ही हुआ। दूसरा अब तक नहीं जन्मा — क्योंकि “एक पहचान” शून्य–शून्य–शून्य से एक में बदलने का विज्ञान कोई नहि समझ पाये अकेला हु 0144ÇR - 0820CR जन जन तक 0Ñ(YX)⁰ⁿ⁰ का अज्ञान पहुंचना और प्रकृति के शुन्य शून्य एक कर से राज्य और दुसरे से केन्द्र को देखना दिखाना प्रकृति सिद्धांत अनवरत प्यार हैं…
0निष्कर्ष : प्राणी और मनुष्य में फर्क <—> संवेदना + चेतना + चयन सबसे बड़ा फ़र्क सम्भोग मे है…
* सर्प जीवित है, पर विवेक नहीं…
* पक्षी उड़ता है, पर मर्यादा नहीं…
* छः पांव वाले धरती पर अनुशासित हैं, पर रस्म रिवाज कोई जानता नहीं फ़िर भी सम्भोग ज्ञान भुला नहीं…
* खरगोश उत्पादक है, पर उद्देश्य नहीं…
* शेर शक्तिशाली है, पर आत्मनियंत्रण खो वारिस बारिश ख़ाक्षी पानी छोड़ने आतुर पर रस्म रिवाज कोई नहीं जाने फ़िर भी कोई जोर जबर जस्टिस नही…
* पर मनुष्य… उसके पास सम्भावना है, चयन है, संस्कार है; फ़िर भी प्रकृति रूप रंग संवेदन स्पर्श को तन थन फ़िर भी ज़ोर जर्जस्ती बस्ती बस्ती शरीर शोषण आम बात कर लेती देती है, बच्चा कि कोई पहचान नहीं…
• वह केवल उसे देती है जो शून्य से एक बनना चुनता है…
* लाल बहादुर शास्त्री जैसे वीर इसलिए विरले हैं क्योंकि उन्होंने जीवन को सिर्फ जीया नहीं, समझा, साधा और समर्पित कर दिखाया और नारा दिया "जय किसान जय जवान देश है सबसे महान…"
मनुष्य का धर्म : स्थानीय से वैश्विक जागृति तक…
* मनुष्य का कार्य सिर्फ वंश-वृद्धि "शुन्य दोकर" भुगतान लेना और देना नहीं है ; वह तो पशु पक्षी बेजुबा भी स्वयं; स्वयं के मलमूत्र का सेवन नहीं करते हैं…
मनुष्य का कार्य है :—> स्वयं को जानना, समाज को उठाना, अनुभव सुनाना शुन्य शुन्य "दोकर" दुख नहि दिक्कत दिखाना और धरती को संतुलिन कर, अपने देह से शुरू कर देश को ऋण मुक्त भ्रष्टाचार मुक्ति के लिए नाम अक्षरो कि सर्जरी करा शुई की नोक के बराबर उपर उठाने में सहयोगी बन नामांकरण क्षेत्र चयन करना है…
* जिस दिन हर व्यक्ति अपने "शुन्य एक" की पहचान कर लेगा, उस दिन मानवता की वास्तविक यात्रा शुरू होती है…