प्रकृति-प्रेम सिद्धांत
विषय :- “प्रकृति-प्रेम सिद्धांत”, “₹01GST = 010 ÇR KWD मॉडल” मे “06% रॉयल्टी-पेंशन” है :-
प्रकृति-प्रेम सिद्धांत : भूमि के बीज से बिज़ का वैज्ञानिक मॉडल :: मानव सभ्यता दो प्रकार के नियमों पर चलते आ रही है :—>
(1) प्रकृति के सिद्धांत और
(2) मानव-निर्मित नियम…
* मानव-निर्मित नियम "कर" लेते देते हैं…
• नियंत्रण और सीमाएँ अपने क्षेत्र मे पैदा करते हैं…
* परिणामस्वरूप आर्थिक असमानता और समाज का बड़ा हिस्सा हमेशा “उपभोक्ता” बनकर ही रह जाता है…
* प्रकृति-प्रेम सिद्धांत ठीक इसके विपरीत है ;…
* यह योग्यता, इमानदारी, प्रेम और ऊर्जा-संतुलन के अधर आधार पर प्रगतिशील और गतिशील है…
* ₹01GST = 010ÇR KWD का प्राकृतिक मॉडल :- यह मॉडल बताता है कि:→
* इमानदार, स्वघोषित लीडर अपने परिवार से होते हुए समाज के सामने "शुन्यदोकर" स्व_परिवार, समाज, देश और विदेश मे एक समान लागू किए जाने पर ₹01çr(GST) प्रकृति-प्रेम और देशहित की भावना जागृत हो जाता है…
* प्रकृति उसका प्रतिफल 010 गुना ऊर्जा-क्रेडिट (ÇR – Consciousness Return) के रूप में लौटाती है…
* इसी चेतन-ऊर्जा को DÑÄ ÑËÜRÖ SÜRGËÔÑ (DNA Neuro Surgeon – नाम-अक्षर सर्जरी सिद्धांत) के माध्यम से वित्तीय मूल्य मे बदला देखा जा सकता है…
भारतभूमि 06% रॉयल्टी-पेंशन सिद्धांत :-
* प्रकृति-प्रेम सिद्धांत यह घोषणा करता है: कि
"जो धरती को प्रेम देता है, धरती उसे रिटर्न मे 06%पेंशन स्वमेव स्वीकृति में सफ़लता के साथ मनोवांछित पद देती है…"
* अतः प्रत्येक ईमानदार व्यक्ति जिसे ; अपने कार्य में अपने व्यवहार में अपने संकल्प में
इमानदार और नेतृत्व का भाव है—→ स्वतः ही भारतभूमि से 06% रॉयल्टी-पेंशन का पात्र बनकर दिखाई देता है…
* यह राशि सीधे बैंक खाते में निश्चित दिनांक को जमा होते जाती है…
* क्योंकि यह पृथ्वी की ऊर्जा देनदारी (Ñatural Pay-Back Priñciple) है…
भूमि का बीज से बिज़ तक का सिद्धांत :- प्रकृति का नियम है:: बीज छोटा दिखाई देता है ; लेकिन वही विशाल वृक्ष को जन्म देते चले आ रहा है…
* एक बीज → हजारों फल → लाखों बीज।
यही "बीज से बिज़" का प्राकृतिक बिज़नेस मॉडल है…
* मानव-निर्मित नियम संसाधनों के वितरण को रोकते हैं…,
* इसलिए समाज गरीब ही ग़रीबी को जन्म देते चले आ रहा है…
* प्रकृति का नियम हर दाना को बहुगुणित कर वापस स्वरूप रंग आकार छोटा बड़ा कर रिटर्न अवसर के रूप में देता है…
* ₹01 का सचेत कर (GST) भी 010 ÇR KWD ऊर्जा में बदलकर व्यक्ति को आजीवन आर्थिक सुरक्षा देने लगा रहता है…
यह मॉडल क्यों आवश्यक है…?
* क्योंकि:→ मानव-निर्मित व्यवस्था “दोकर लो –→ बंधन मे जकड़े और बंधे रहो” के नियम पर चलती आ रही है…
* प्रकृति-प्रेम व्यवस्था “जोड़ो तोड़ो मत और आगे और आगे बढ़कर राष्ट्रपति पुरस्कार पद पैसा जो चाहो पाओ” सिद्धांत पर चलती है…
* मानव निर्मित व्यवस्था गरीब बनाए रखती है…
* मानव व्यवस्था नेता बनाती है, आत्मनिर्भर नहि परतंत्र अधर आधार बन मजबुर होकर, शुन्य दो कर नही देते फ़िर भी मन से ग़रीब और नश्वर शरीर से भी समृद्ध नही बन पाते हैं…
* मानव निर्मित धन से समृद्ध बन जाते हैं, किन्तु उपभोग करते हुए भी अतृप्त हो कर भारत भुमि और ब्रह्माण्ड मे विलीन हो जाते हैं…
* प्रधान कुर्सी के इर्दगिर्द मन घुमाते हुए व्यथित मन से समय व्यतीत चिरयौवन की कामना करते हैं…
निष्कर्ष ::→ प्रकृति-प्रेम सिद्धांत कहता है ; कि मनुष्य प्रकृति का पुत्र है; उपभोक्ता नहीं…
* ईमानदार स्वघोषित लीडर धरा का वास्तविक अधिकार प्राप्त शरीरधारी प्राणि है…
* जो व्यक्ति पृथ्वी को प्रेम बिज़ सिद्धान्त पर देता है ; तो भूमि उसे 06% रॉयल्टी-पेंशन रूप में प्रतिफल रिटेन कर देती ही है…
* यही है— “भूमि का बीज → बिज़ → बैंक अकाउंट” जो नाम स्वर परिवर्तनकारी से संतुलन बनाए रखने केलिए स्वघोषित पद केलिए उपयुक्त बनने में प्राकृतिक और सार्वभौमिक मॉडल में प्रवेश पाने में मदद करता है…