योग क्या है
*योग क्या है*
• योग से जिवन कि हर इच्छा पूर्ति करने का साधन जरूरत से ज्यादा वस्तु स्थान पदार्थ मिश्रण योगिग प्राप्ति केन्द्र नाभि संतुलन सहमती योग है…
• जिवन सार योग है…
• जीवन रस योग शिक्षा अनिवार्य रोज़गार है…
• जीवनी पाठ निभाना करदाता हक़ीक़त उर्जा संग्रहण पराग वितरण कलरफुल रोशनी यादगार लम्हा है…
• शरीर योग उद्योग मिश्रण 01यूनिट इकाई 009द्वार मे 01 द्वार नाभि स्थाई रूप से बंद आंख मुख वंशावली वरदान है…
•01नाभि का खुलना आज इमेजिनेशन का हथियार है …
• प्रेम दास नही सेवक महान इन्सान विद्यार्थी बेज़ुबान बैठा इम्तिहान पास फ़ैल रेकॉर्ड है…
• कर संग्रहण परिपक्वता जनम फल कल्पना शक्ति साकार मुरलि क्लास है…
• योग प्रवेष निश्चित करम श्रेष्ठ अध्यात्म है…
• ०१. योग प्रवेष : जल पवन सुर्य गगन और धरती ये सभी इको वातावरण निर्माण करण करावन हार है…
• ०२. जॉब योग प्रवेष : शासकीय, निगम, अर्ध शासकीय कार्य प्रवेष में विलीन होता है…
• ०३. नाभि प्रवेष योग :•: स्व कल्याण प्रवेष मुख द्वार मे से कुच करते हुए (दिल±मन) 09द्वार के साथ आंतरिक उड़न भरी जाती है जो ↓भूगर्भ से होते हुए आंतरिक ज्ञानगंगा के साथ पुनः ↑↓धरती पर मौजूद पिण्ड में प्रवेष कर शरीर उद्योग में लिन माता पिता के कर में अधर आधार पर नई दुनिया स्थापित करने मे स्वमेव लग जाता है…
• प्राकृतिक प्रेम का नज़ारा देख हर्षित दिल±मन को किसी वस्तु स्थान हवा जलवायु वातावरण परिस्थिति विचलित या प्रफुलित नहीं करती है और किसी भ्रम मायाजाल मे फंसता नही है…
• प्रकृति कर सन्तुलन सिध्दांत बिज़ आदान प्रदान अटल अमर अविनाशी अपरिवर्तनीय शक्ति सम्पूरण ब्रह्माण्ड में प्रचलित है, यह मानव को पद्मपति डिस्ट्रीब्यूटर नाभि केन्द्र मे से लगातार ऊर्जा का आदान प्रदान करता है…
• योग क्या है — जीवन, प्रकृति और कर-संतुलन का जागृत विज्ञान:•: • योग केवल आसन या श्वास-प्रश्वास नहीं है…
• योग जीवन सार है—इच्छा, आवश्यकता, साधन और संतुलन का समन्वय करना काम है…
• योग वह सहमति-बिंदु है जहाँ मन, दिल, शरीर, प्रकृति और कर्म एक-दूसरे से टकराते नहीं, बल्कि सहयोग करते हैं…
• योग: इच्छा नहीं, संतुलन की कला सिखाता है…
• योग का उद्देश्य जरूरत से अधिक वस्तु-संग्रह नहीं, बल्कि आवश्यकता की शुद्ध पहचान है…
• इच्छा विवेक से जुडती है तब योग बनता है…
• संतुलन जीवन को बोझ नहीं, रस देता है…
• जीवन-रस और रोज़गार का योग:•:
• जीवन-रस योग शिक्षा अनिवार्य रोज़गार है :•: जहाँ कर्म, कर, और कर्तव्य टकराते नहीं, शून्य शुन्य पर स्थिर हो परिणाम फ़ल देता हैं…
• जीवनी-पाठ मे छीपी निर्भय कर चुकाना हक़ीक़त है…
• ऊर्जा संग्रहण कर पराग-वितरण यह वह रंगीन रोशनी है जो जीवन को यादगार लम्हा देती है…
• शरीर :•: योग उद्योग मिश्रण नही समानुपात योगिक है…
• शरीर एक योग-उद्योग है—एक इकाई, नौ द्वार, और एक नाभि केंद्र प्रगति अधर आधारित उपभोक्ता प्रोसुमर अध्यात्म औशधि जग़त है…
• नाभि स्थिर अन्दर से बाहर शून्य शुन्य एकशून्य पर निर्भर करता है…
• आज उसका खुलना इमैजिनेशन का हथियार है…
• जहाँ कल्पना, संकल्प बनती है और संकल्प कर्म का शुन्य शुन्य नौ किरण द्वार खुलवा देता है…
• प्रेम : दास नहीं, सेवक महान इन्सान विद्यार्थी बेज़ुबान नही फ़िर भी चुप झुकी नज़र वाला प्राणि रोगि है…
• प्रेम दास नही—सेवक कर चुकाएं भाई बहन हवाई यात्रा बिना दवाई उद्योग संचालक राष्ट्रध्यक्ष महान है …
• महान इंसान वही है जो विद्यार्थी बनकर कर चुकाए जिवन बिताए बिन हार जीत दर्ज किए मर जाए …
• ज़ुबान पर बैठा इम्तिहान हर पल है— क्या हम बोलने से पहले संतुलन कर सुनते हैं…?
• योग-प्रवेश :•: अध्यात्म की श्रेष्ठता :°•°:
• योग-आंतरिक प्रवेश निश्चित करना श्रेष्ठ अध्यात्म :•: है…
• क्योंकि यह पलायन नहीं, आंतरिक प्रवेश कर बाहर खड़ा आड़ा तिरछा लेटना सोना सिखाता है…
• 01. योग-प्रवेश (प्रकृति):•: जल, पवन, सूर्य, गगन और धरती—ये पाँचों मिलकर इको-वातावरण रचते है…
• योग 005का बिना टकराव स्थिर सामंजस्य प्रभाव शाली प्रेरणा दायक है…
• 02. जॉब-योग प्रवेश (कर्म) :•: शासकीय, निगम, अर्ध-शासकीय—हर कार्य में योग तब है जब कर्तव्य सेवा भक्ति कर भुगतान शुन्य शून्य एक नियम अनुसरण कर्त्तव्य कर्मचारी अधिकारी प्रमुख सचिव नियम के अधीन है…
• 03. नाभि-प्रवेश योग (स्व-कल्याण):•: मुख-द्वार से संकल्प, दिल±मन के साथ नौ द्वारों में संतुलन…
• भूगर्भ से आंतरिक ज्ञान-गंगा, फिर धरती पर लौटकर शरीर-उद्योग में लीन— माता-पिता के कर में अधर-आधार बनकर नई दुनिया का निर्माण स्वत: कर भुगतान व्यवस्था वरदान परसाद है…
• प्राकृतिक प्रेम की अवस्था :•: जो प्राकृतिक प्रेम मे स्थिर है— वह वस्तु, स्थान, हवा, जलवायु या परिस्थिति से विचलित नही हो कर समय संस्कार स्वास्थ्य सुरक्षा देशहित प्रारंभिक शिक्षा लेता है…
• प्रकृतिप्रेमि प्रफुल्लता में बहकता नही है, और भ्रम-मायाजाल में फँसता नहीं है…
• यही स्थिर आनंद खुलवाता नाभि द्वार है, प्रकृति-कर संतुलन सिद्धांत बिज बिज़ मुख वंशावली वरदान है…
• प्रकृति में कर-संतुलन अटल, अमर, अविनाशी है, ऊर्जा का आदान-प्रदान निरंतर चलता है…
• मानव, जब जागृत होता है, तो पद्मपति डिस्ट्रीब्यूटर बनकर नाभि-केंद्र से ऊर्जा बाँटता है…
• स्वयं भी जिज्ञासु शिष्य शिक्षक प्रयोग करता संसार भी समृद्ध साम्राज्य सूत्रधार परिणाम फ़ल है…
• निष्कर्ष :•: योग कोई पलायन नही—प्रवेश द्वार खुलवाता है…
• कर कोई संग्रह नही…इको सिस्टम वितरण शुन्य शून्य एक ज़मीन केन्द्र संतुलन सिध्दांत है…
• कर समाधान कोई वर्चस्व नहीं— उत्तराधिकारी चयन सहमति एक समान वातावरण निर्माण है…
• जब उपरोक्त सभी बिंदु जागृत होकर अधर आधार प्रकृति-सिद्धांत के साथ कर-आदान-प्रदान करते हैं, तब जीवन स्वयं योग बनता है…
• सूक्ष्म, प्रभावशाली और प्रेरणादायक समय संस्करण राज़योग आत्मज्ञान अंतर्मन नीति अनीति पढ़ाए कोई नही इको सन्तुलन रजकण बहार से अन्दर छीपी सोई हुई शक्ति अपार धन समय बुद्धि ब्रह्मकमल घरपर रोज़गार उपलब्ध है…