पढ़ा-लिखा बनाम अक्षर ज्ञानी
पढ़ा-लिखा बनाम अक्षर ज्ञानी
* मनुष्य जीवन का दो पहलू है–
* एक "पढ़ा-लिखा" …
* दूसरा "अक्षर ज्ञानी"…
* दोनो मे अणतर बहुत गहरा है....
01. शिक्षा का स्रोत:…
* पढ़ा-लिखा होना केवल विद्यालय, डिग्री या किताबो से जुड़ा हुआ है…
* अक्षर ज्ञान, विज्ञान, अध्यात्म और सणयुक्त परिवार की जीवनशैली से जणमा कर दाता होता है…
* अक्षर ज्ञाणि सच्चा ज्ञाण समाज, परिवार, अणुभव और इश्वर की कृपा से मिलते हैं …
02. सणगत और सीख…
* सणगत का असर मनुष्य के जीवण को दिशा देता है…
* सणगत सिखाती है कि क़र्ज़ और फ़र्ज़ मे अणतर क्या है…‽
* जीवण शून्य शून्य दोकर भुगताण की सच्चाई का फ़ल अधर आधार पर टिका हुआ जल कमल फल होता है---…
* अक्षर अज्ञाणि अणुभव से व्यवहारिक जीवणी का दूसरो का सहारा बनता है---…
* पढ़ा-लिखा अकसर सूणि सुनाई दणत कथाओ से उत्पन्न अनपढ़ गाणव की कहानी पर टिकी टिकाई नज़री नक्शा धारी गुणकारी होता होती प्राणी भगवान है---
* प्रकृति दिल और सैद्धांतिक ज्ञान से भिज्ञ, पुस्तकिय ज्ञान के ऊपर, असीमित अज्ञानी अपने दायरा के जीवन यापन कर्ता स्वयंभू धड़कता दिल, मै अग्यानी हू…
03. दिखावा और व्यवहार…
* आज का पढ़ा-लिखा समाज अकसर लेख मे, पढ़ने पढ़ाने वाले पाषाण युगी दिखावटी और चल-चित्र के अभिनय मे उलझा हुआ मानव भगवान है…
* फिल्मी अभिनय के पात्र होते हैं…,
* पढ़े लिखे मानव का जीवन चमक-दमक से भरा दिखाता है लेकिन वास्तविकता से कोसो दूर नज़र हीन मेहनत कस भगवान होता है…
* दूसरी ओर, अक्षर अज्ञानी व्यक्ति हक़ीक़त के करीब साधारण इंसान रूप गुणों की ख़ान स्व वाणी जीवन दाता शून्य एक का सिद्धांत वादी मौन धारी अधारी रहता है…
* वह मौन, गम्भीर और सरल व्यवहार से जीवन को सार्थक बनाने के लिए अपने पूर्वज के पद चीणहो पर चलते चलते समाज मे प्रेरणा स्रोत का काम करता कर्ता है…
04. अ शरीरी जीवनी ही शूणय सत्य सणत अभिप्राय है…
* जीवन मूलतः एक शून्य हक़ीक़त है…
* हर इंसान पिता का अंश और माता के पूर्वज के नक्श कदम पर चलता फिरता अनपढ़ दृष्टि हीन पैदा नही होते है…
* पढ़े लिखे भगवान के समान सभी एक समान नही बनते है…
* पढ़े लिखे अपने आंतरिक नक्श कदम को छलावा के प्रतिबिंब से असली आत्म छबी को छिपाते छिपाते खुद को भुला देते है…
• पढ़ा-लिखा व्यक्ति छलावे मे उलझा हुआ मानव जीवन के वास्तविक भगवान कि पहचान मे स्वयं को भूल कर दूसरो के दिल मे ???? दिलदार बनने से चूक गए है…
• अक्षर अज्ञानी अनुभव से छलावा के आवरण को पहचानकर सत्य की ओर लगातार कदम आगे बढाता है…
05. अणतर से छलाणग…
* पढ़े-लिखे और अक्षर ज्ञानी के बीच का अंतर 01- 010 के मध्य {09_9} एक समान देखता है… जबकि यह छोटा-सा अंतर आगे चलकर 99 से 0990 तक की छलांग का प्रतिबिंब चित्र ही नही वास्तविक स्वतंत्र जीवन बणाता है …
* शून्य एक, एक छलांग तय करना प्रकृति नही सिखाती बल्कि एक्स पॉवर एक्स वाय जेड और अनंत ♾️ स्वमेव करती है…
* इंसान केवल दिखावे मे "पढ़ा-लिखा" बनता है---
* गहरे अनुभव वाला "अक्षर अ ज्ञानी" बन पारदर्शी ब्रम्ह अस्त्र धारी बनता है------
निष्कर्ष:....: केवल पढ़ा-लिखा होना पर्याप्त नही है…
* असली मूल्य अक्षर ज्ञान, व्यवहार, संगत, परिवार और आत्मचेतना से आता है…
* शून्य एक अ ज्ञान इंसान को हक़ीक़त मे जीना और जीवन को सार्थक बनाना सिखता सिखाता है---