कोर्ट नहीं - सिर्फ वाणी
✍️ लेख : कोर्ट नहीं – सिर्फ़ वाणी
* मानव समाज मे विवाद, मतभेद और असहमति होना स्वाभाविक है…
* असहमतियो को सुलझाने के दो मार्ग है :-
01. पहला, अदालत (कोर्ट) का मार्ग :-
02. दूसरा, सणवाद (वाणि) का मार्ग…
०१. कोर्ट का मार्ग :-
* कोर्ट न्याय का औपचारिक सणस्थान है…
* जहा कानून और नियमो के आधार पर फैसला होता है…
* इसमे समय, धन और दोनो ओर कि मानसिक ऊर्जा अत्यधिक खपत होती है…
* सालो तक मुकदमे चलते है…
* सत्य और असत्य के बीच अक्सर सीमाए धुणधली होती है…
* न्याय मिलने की प्रक्रिया इतनी जटिल होती है कि पीढ़िया बीत जाती है…
०२. वाणि का मार्ग :-
* वाणि सीधे हृदय से निकलती है…
* इमानदार वाणि और नम्रता से समाधान कि भावना को, 09गुणा कर, वहि बोली भाषा को किसी भी अदालत से बड़ा न्याय दिलाती है…
* सार्थक सणवाद से गलतफहमिया दूर होती है…
* दिल कि वाणि से आपसी रिश्ते मजबूत होते है…
* बिना खर्च, बिना विवाद समाधान का 01शब्दबाण पत्थरदिल पिघला देता है--- …
०३. उदाहरण :-
* पणच परमेश्वर की परंपरा मे गावो के विवाद सरपणच की वाणि से सुलझ जाते थे…
* अदालत की कोई जरूरत नही पड़ती थी…
* महात्मा गांधी का सत्य और अहिंसा पर आधारित वाणी का मार्ग ब्रिटिश साम्राज्य जैसी शक्ति को झुकाने में सफल रहा…
* आज भि इमानदारि और अहिणसा के मार्ग पर चल कर शासन प्रशासन उद्योग अध्यात्म समाज परिवार कि समस्या, व्यक्तिगत अनुभव से, कर अधर आधार पर बड़ी से बड़ी सफ़लता का फ़ल देख कर दिखाया जाता है…
* सफ़लता फ़ल प्राप्ति हेतू 036सिर्फ़ इकाई अणक कि जानकारि ज़रूरि है…
०४. सिद्धाणत :-
* जहा सणवाद है, वहा विवाद नही रह सकता है…
* जहा वाणि है, वहा हिणसा नही हो शक्ति है…
जहा समझ है, वहा अदालत कि आवश्यकता नहि पढ़ति है…
०५. निष्कर्ष :-
* अदालत न्याय दिलाती है…
* वाणि रिश्ते बचा कर भविष्य सणवार कर से ट्री तैयार करती है…
* अदालत के फैसले से दिल टूटते है…
* वाणि के समाधान से दिल जुड़ते है…
* इसलिए समाज को चाहिए कि पहले मधुर वाप्राणि से समाधान खोजे…
* आवश्यकता पड़ने पर अदालत का सहारा ले---
सणक्षेप मे : -
* कोर्ट नही – सिर्फ़ वाणि का अर्थ है…09कि मानवीय जिवंत टिम और समाज कि असलि शक्ति न्यायालयो मे नहि…
* 09इमानदारो कि सणयमित और समाधानकारि मधुर वाणि वाणी मे है…
* 010 नारद कि नहि णारायण कि बाणि, आवश्यकता (०२१) कि प्रकृति पूर्ती कृति है…