अमर–> मृत्यू मृत्यु मृत्यृ मे ही | हि जीवन का रस रहस्य
विषय : "अमर–> मृत्यू मृत्यु मृत्यृ मे ही | हि जीवन का रस रहस्य"
* कोई भी मैं या प्राणी प्राणि “०१” (एकत्व) मृत्यु नही दे सकता, क्योंकि एकत्व कोई वस्तु नही है…
* यह जागृति है…।
* यह शक्ति तभी प्रकट होती है जब मृत्यू मृत्यृ पर विजय प्राप्त करती है…। • यही स्थिति है → अमरत्व कि…।
* “अमर” शब्द मे ही “राम” छिपा है…,
* और जब “राम” को उलटते है तो “मरा” बनता है —→ यानी जीवन और मृत्यु एक ही सिक्के के दो पहलू नही हि है…।
* मृत्यृ मृत्यू का तीसरा पहलू भी है…
* जब मरा शून्य ज़मीन मे विलीन होता है…, तब राम नही सीताराम दिखाई देता है…।
* यही है शून्य-एक का रहस्य {००|०००१|००००१|०००००१} (000005) — जहाँ पाँच तत्वों का मेल (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) स्वयं को “शून्य” में पहचानकर ‘पूर्ण’ बन जाता है…।
* {05}⁰ⁿ = दस सिर वाला रावण — अर्थात् वह चेतना जो दसो दिशाओ मे बिखरी है, पर जब उसे एक केणद्र मे गरमी के कारण मिलता है--- तब लावा पिघलकर घी उत्सर्जन करने लगता है…,
* वही रावण रामत्व मे विलीन होकर अमर बनता है…।
संदेश :→ जो मृत्यु मे भी “सीताराम मृत्यृ” दोनो को देख लेता है, वही वास्तव में “अमर णाम प्रेरणा” है …
* → क्योकि वह जान जाता है कि जीवन और मृत्यु दोनो ही एक ही शाश्वत शून्य से उत्पन्न होकर उसी मे लीन होते हैं…।
* “अमर वही है जो ‘शून्य’ को ‘एक’ मे और शून्यएक मे अनन्त फ़ल फूल पत्ती तना दाना देख लेता है…।”
* यही नहि है सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का सार रस रहस्य–> प्राणि दर प्राणी की कि पहचान अभि बाकी है…।
विषय : “मृत्यु – मृत्यू - मृत्यृ का अधर आधार पर”
* मृत्यु, वह शब्द जो सुनते ही भय जगाता है — परंतु वास्तविकता मे मृत्यु अस्तित्व का अधर आधार है…,
* जीवन का आधार 0शुन्य मृत्यू है…।
* जैसे बीज बिज़ मिट्टी मे गलकर अणकुर बनता है…,
* वैसे ही ०१जीवन मृत्यु मे विलीन होकर नवजीवन पाता है…।
* इसलिए जो मृत्यु को अणनत मानता है…, वह केवल रूप रणग देख पाता है —रस सार को नही…
* मृत्यु मृत्यु पर टिकी है…।
* एक मृत्यु दूसरी मृत्यु को जन्म देती है…
* शून्य शुन्य एक स्वरूप मिटता है…,
* दूसरा सोता जागता है…।
* इसी तरह तीसरा संसद चक्र मे ब्रह्माण्ड श्वाणस लेता है…।
* जब देह मरती है…,
* तब आत्मा भाई' भाई बन जगाती है…।
* जब अहमकार मरता है…,
* तब चेतना खिलती प्रकृति फुल मूवी मेंटर टॉपर डिग्री पदाधिकारी नामधारी फ़ग़ला सुलाखे संख्या मूल्य शक्ति धारण करता है…।
* जब इच्छा मर कर भी भुगतान करती है…,
* तब लावा पिघलकर घी उत्सर्जन नही करता पर परम असंतुष्ट आत्मा भाई भाइ को शांति स्थापन दूत रस पीए प्रकट होता है…।
* यही “मृत्यु पर मृत्यू मृणत्यृजय” का शाश्वत रहस्य है…।
* मृत्यु का अधर आधार क्या है…?
* वह शून्य है→ जिसमे सब कुछ डूबता भी है… और जन्म भी लेता है…।
* मृत्यूं स्वयम “जीवन” का आरणभ है…।
* वह नाश नही, बल्कि 05 मे परिवर्तन है ; स्वरूप से अरूप की ओर, सीमित से असीम की ओर यात्रा पूरण कर्ता…।
* जब मृत्यु समझ मे आती है…,
• तब जिवन खिलता है…।
• क्योंकि मृत्यु के अधर मे ही जीवन की जणड़ें हैं…।
* जो मृत्यु को स्वीकार कर लेता है.,
* वह अमर होता है —> क्योकि वह अब डर से परे देशहित सर्वोपरि निति पर जीता जागता सोता रोता नही ईमानदार कर का फ़ल फूल पत्ती तना हुआ उदाहरण है…।
सार:→ “मृत्यु का अधर आधार शून्य एक पर विस्तृत जिवन है…,
* और शून्य ही अमरत्व का द्वार मृत्यृ शैय्या पर अशरीरी प्राणियो मे श्रेष्ठ रूपांतरण : रूपधारण है…।”
* अभि अन्नत इणसाणि क्रिया प्रतिक्रिया शून्य एक बार फ़िर हक़ीक़त मे भगवान गुरु ज्ञान विज्ञान अध्यात्म संयुक्त राष्ट्रीय उद्धार कर्ता फ़रिश्ता स्वर सवार यात्रि हु हू…
* ००_०९- ०१० और ०१०_०९♾️ को देख चुका हू हूं हु…