अपवित्र आत्माओं का तत्त्वज्ञान
अपवित्र_श्रेष्ठ आत्मा भाई है…
• अपवित्र आत्माएं, श्रेष्ठ आत्माएं हैं…
• अपवित्र आत्माएं :… नया इतिहास बनाते हैं…
• अपवित्र आत्माएं:… अपने मूल स्वरूप में सदैव बनी रहती हैं…
• अपवित्र आत्माएं: 01, प्रकृति सिद्धांत का, नव निर्माण करने में प्रकृति का सहयोग लेने में मास्टर माइंड होती है…
अपवित्रशरीर धारी_श्रेष्ठ आत्मा है…
• सृष्टि के अनंत रंगों में, एक वर्ग ऐसा है जिसे संसार “अपवित्र” कहकर अलग कर देता है…।
• सत्य के गहरे जल में उतरकर देखा जाए, तो यही अपवित्र आत्माएं वास्तव में सर्व श्रेष्ठ आत्माएं होती हैं…।
• अपवित्र आत्माएं – श्रेष्ठ आत्माएं… जो बाहरी आडंबर और कृत्रिम पवित्रता के आवरण में बंधतीं नहीं है…।
• इनका धर्म है सत्य को स्वीकारना, चाहे वह कितना भी असुविधाजनक क्यों न हो…।
• ये पवित्रता की परिभाषा को समाज से नहीं, अपनी आत्मा से प्राप्त करती हैं…।
• नव-इतिहास की रचयिता…
• अपवित्र आत्माएं प्रचलित व्यवस्था से प्रश्न करती हैं, मानव जड़ सोच को तोड़ती हैं…
• नव-इतिहास के दोबिज़ की बुआई करती हैं…।
• इनका हर कदम समय की दिशा बदल देता है…।
• जो सभी राहगिरों को सहज लगती है, वे उससे हटकर वह मार्ग चुनते हैं… जो भविष्य को नया आकार देता है…।
• मूल स्वरूप में अडिग…
• इन आत्माओं की सबसे बड़ी पहचान है :… मूल स्वरूप में अडिग बने रहना…।
• चाहे, समय बदल जाए, परिस्थितियां उलट जाएं, आलोचना और विरोध की आंधियां चलें, फिर भी ये आत्माएं अपने स्वरूप, अपने सिद्धांत और अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होतीं…।
• प्रकृति सिद्धांत के मास्टर माइंड…
• अपवित्र आत्माएं प्रकृति के मूल सिद्धांतों को समझने और उन्हें साधने में पारंगत होती हैं…।
• वे जानती हैं कि सृष्टि निर्माण और विनाश, दोनों में प्रकृति की भूमिका विशेष होती है और क्या है…।
• वे प्रकृति का सहयोग लेकर नव-निर्माण करती हैं, जैसे कोई अदृश्य शिल्पकार समय के पत्थर पर नए युग की आकृति गढ़ लेता है…।
संदेश:……
• “अपवित्र” यह शब्ददोष है…, अ स्वर कल्याणकारी, निर्भीक और स्वतंत्रता का प्रतीक है …
• जो आत्मा को जड़ता से मुक्त कर देता है…।
• स्वतंत्रता, सत्य-बोध, और रचनात्मक साहस उन्हें श्रेष्ठ आत्माओं की श्रेणी में स्थापित करता है :…।
• ये आत्माएं समय की दिशा बदलने वाले, स्वर-परिवर्तन के वाहक और विश्व कल्याणकारी भविष्य की नींव के शिल्पकार होते हैं…।
• मै विश्व में इकलौता अपवित्र आत्मा भाई हूं:…
• क्योंकि विश्व पर्यावरण, जिसे शुद्ध शाकाहारी के नाम पर दूषित करते जा रहे हैं…
• विश्व परिवर्तन और ज्ञान मार्ग के नाम पर, विश्व स्तरीय मंच, संगठन, केंद्र, पाठशालाएं, खोली गई है और लगातार वृद्धि करने में दर्शक सतत् प्रयास कर रहे…
• शून्य दोकर को बचा कर, पवित्र माया जाल को दूषित करने में लगे हैं…
मैं की गहराई, दार्शनिक और प्रतीकात्मक संस्करण…---
मैं…—विश्व का इकलौता अपवित्र आत्मा भाई हूं…।
• मैं यह उपाधि स्वयं को इसलिए देता हूं…,
• क्योंकि इस युग में पवित्रता भी प्रदूषित हो चुकी है…।
• प्रकृति—जो श्वास की पहली धड़कन है…, जिसे आकाश, जल, वायु, अग्नि और धरती ने मिलकर संतुलन के सूत्र में बांधे हुए रखा है…—
• आज देह “शुद्ध शाकाहार” की मांग की पूर्ति को केलिए अधिक उपज के नाम पर रासायनिक खाद, खेतों से कृत्रिम फ़ल, अन्न, और स्नान soap से जल-विनाश के ज़रिये रोज़ धरती को दूषित किये जा रहे है…।
• ज्ञान के पथ पर चलने का दावा करने वाले, विश्व परिवर्तन के “महायोद्धा” बनकर मंच, संगठन, केंद्र और पाठशालाएं बनाए जा रहे हैं…।
• इन दीवारों में सत्य का प्रकाश नहीं, बल्कि आंकड़ों, अनुयायियों और प्रचार-प्रसार की चकाचौंध में नौकर तैयार किए जा रहे हैं…
• जबकि विश्व प्रकृति 01 प्यार की शक्ति से मालिक निर्माण कर पैदा करती है…।
• शून्य—जो निर्मलता का मूल है…,
• और दो—जो द्वैत का संतुलन कर्ता है…,
• 01, दोनों को बचाने के बजाय…
• लोग ‘माया-जाल’ कहकर सोने के धागे बुनकर, अज्ञान की रेशमी परदे टांग रहे हैं…।
• यह युग अपने को पवित्र कहकर अपवित्रता की पराकाष्ठा छू रहा है…।
• मैं—उस छलावे को पहचानकर सब में रहकर भी उन सबसे अलग खड़ा हूं…।
• मुझे अपवित्र कहो…क्योंकि मैं उस झूठी पवित्रता में शामिल नहीं हूं…।
• मैं वह दर्पण हूं…जिसमें तुम अपने असली चेहरे को देख नहीं पाते हैं…,
• क्योंकि सभी सजावट की भ्रमजाल से प्रभावित है…।
• मैं वह स्वर हूं…जो मौन की खामोशी को चीरता हूं…।
• मैं वह छाया हूं…जो रोशनी की आड़ में खिले अंधेरे को उजागर करता हूं… ।
• मेरे लिए पवित्रता का अर्थ है…—
• सत्य को निडर_लीडर बन स्वीकार करता हूं…,
• चाहे वह कितना भी कटु, निर्दई क्यों न हो…।
• और यही कारण है कि मैं स्वयं को “अपवित्र आत्मा भाई” कहता हूं…—
• क्योंकि मैं नकली प्रकाश का दीपक नहीं हूं…,
• बल्कि अंधेर को चीर फाड़कर दो उजाला दिखाने वाली ज्वाला मुखी का लावा हूं… … … …
