कल्पना-शक्ति से विश्व-कल्याण
विषय: कल्पना-शक्ति से विश्व-कल्याण…
* मानव जीवन की सबसे सूक्ष्म, सबसे दिव्य और सबसे प्रभावशाली शक्ति है :- कल्पना-शक्ति है…
* यह वह शक्ति है ; जो मनुष्य को पशु से अलग करती है…
* यही वह क्षमता है जो भविष्य को वर्तमान में खींच लाती है…
* कल्पना केवल निजी लाभ तक सीमित रहती है, तो उसका प्रभाव सीमित होता है; परंतु जब वही कल्पना-शक्ति विश्व-कल्याण को अधर आधार बनाकर “पुरण (02 कर)” जैसे सिद्धान्तों पर कार्य करती है, तब वह इतिहास रचने वाली शक्ति बनती है…¡---
01. कल्पना-शक्ति क्या है…?
* कल्पना-शक्ति मन का वह दिव्य कार्य है जिसमें मनुष्य भविष्य की वस्तु, परिस्थिति, परिणाम को पहले सूक्ष्म रूप में देख लेता है…
* कल्पना एक सूक्ष्म बिज़ बीज में 01 अन्तर देख कर भुगतान करता है : -
* जिसमें विचार जल है…
* भावना प्रकाश है…
* और संकल्प सपना (लक्ष्य) उसकी ऊर्जा है…
* इन तीनों के संगम से मनुष्य अपनी वास्तविकता को बदलता है…¡---
02. विश्व-कल्याण क्यों और कैसे…?
* आज मनुष्य के सामने अनेक में (04) चार प्रमुख चुनौतियाँ हैं :— बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, दुःख-अशांति, और कन्फ्यूजन …
* केवल नीतियाँ इन चुनौतियों को हल नहीं कर सकतीं, जब तक मन एक नई दिशा में जागृत न किया जाय…
* “विश्व-कल्याण” केवल एक भावना नहीं, बल्कि एक चेतन निवेदन है कि :—> “मै जो भी सोचूँ, बोलूँ और करूँ— वह समस्त मानवता के हित में होना चाहिए़…”
* यही भावना कल्पना-शक्ति को स्वार्थ से ऊपर उठाकर कल्याणकारी शक्ति बनती है…।---
03. पुरण (02 कर) का सिद्धान्त — संतुलित जीवन का आधार आधार {001अ इ} …
* पुरण (02 कर) का अर्थ है :—>
03. 1. एक कर – बाह्य संसार का योगदान
(व्यवहार, सेवा, श्रम, दान, समाज के प्रति जिम्मेदारी)…
03. 2. दूसरा कर – आन्तरिक संसार का योगदान (विचारों की शुद्धता, भावनाओं का कल्याण, आत्म-संकल्प - लक्षय की पवित्रता)
* यही दो “कर” मिलकर मनुष्य को पूर्ण – पुरण बनाता है…
* यह आधुनिक प्रशासन + प्राचीन आध्यात्मिकता का संगम है…
* बाहरी कर (External Duty):- प्रकृति, समाज, राष्ट्र और मानवता के कार्यों में योगदान देना :-
* सत्य, न्याय, पारदर्शिता और श्रम-निष्ठा …
* आंतरिक कर (Internal Duty)…
* अपने विचारों को शुद्ध, कल्याणकारी और समाधानकारी बनाना…
* कल्पना-शक्ति से सकारात्मक भविष्य निर्माण…
* मन को सहृदय, स्थिर, विनम्र बनाना…
* जब ये दोनो शुन्य कर मिलते हैं, तो मनुष्य व्यक्ति से विश्व-पुरुष बनता है…।---
04. कल्पना-शक्ति + पुरण (02 कर) = परिवर्तन का महामंत्र :-
* कल्पना-शक्ति बिना अनुशासन, बिना उत्तरदायित्व के व्यर्थ है…
* और कार्य (कर) बिना कल्पना-शक्ति के अंधवत्व की निशानी है…
* इसलिए दोनो का संगम विश्व-कल्याण का अधर आधार बनता है…
* सुत्र :-> “कल्पना दिशा देती है, पुरण (02 कर) गति देता है…
* दोनो मिलकर विश्व-कल्याण का मार्ग बनाता हैं…”
* उदाहरण:- यदि कोई व्यक्ति बेरोज़गारी-मुक्त भारत की कल्पना करता है ; और उसके लिए
बाहरी कर (काम, प्रशिक्षण, सेवा) तथा भीतरी कर (सकारात्मक संकल्प, प्रेरणादायक विचार) दोनों को जोड़ता है…
* यह कल्पना व्यवहारिक परिणाम देने लगती है…।---
05. विश्व-कल्याण की कल्पना कैसी हो....?
* मन-मनुष्य हर देश मे सहज खुशी और सुरक्षा चाहता है…
* धर्म, जाति, भाषा से ऊपर प्रकृति सिद्धान्त मानवता पर धन्यवाद शासन प्रशासक प्रकृति और मनुष्य मित्र बनकर समय संस्करण राज़योग आत्मज्ञान अंतर्मन नीति अनीति पढ़ाए जाते हैं…
* शिक्षा—सिर्फ नौकरी नही, चरित्र और नेतृत्व को शासन—भ्रष्टाचार-रहित, न्यायपूर्ण और पारदर्शीता व्यक्ति—आत्म-ज्ञानी, आत्म-अनुशासित और आत्म-स्वतंत्र बनते है…
* ऐसी कल्पनाएँ केवल विचार नहीं—
कर्म बनकर विश्व का भविष्य बदलती है…।---
06. निष्कर्ष — कल्पना-शक्ति से विश्व-कल्याण शून्य एक पर सम्भव शोध है.…
* जब मनुष्य अपनी कल्पना-शक्ति को “मेरे लिए” से उठकर “विश्व-कल्याण के लिए” समर्पित करता है, और उसे पुरण (02 कर) के अनुशासन मे ढलता है :— तब वह व्यक्ति नहीं, परिवर्तन का स्रोत बनता है…
* यही आधुनिक युग में नया (०१अ इ) सिद्धांत है:—> कल्पना + आंतरिक-कर + बाह्य-कर = विश्व-कल्याण…
* यह विज्ञान आध्यात्मिक भी है और प्रशासनिक भी…
* यही नई मानव-संस्कृति की नव सृजन शरीर उद्योग की फैक्ट्री नींव है…¡---