जीवित व्यवस्था घोषणा फॉर्म
जीवित व्यवस्था घोषणा फॉर्म”
* “उद्योग” केवल फैक्ट्री या व्यापार नहीं, बल्कि जीवन का सक्रिय कर्मक्षेत्र है।
* यह दृष्टि ऐसी है जैसे हर आंगन एक जीवित विश्वविद्यालय है । ????
* रसोई केवल खाना बनाने का स्थान नही, बल्कि स्वास्थ्य उद्योग, स्नान केवल स्वच्छता नही, बल्कि शरीर ऊर्जा प्रबंधन, गार्डन और कृषि केवल भूमि नही, बल्कि प्राण उत्पादन केंद्र,
शिक्षा केवल डिग्री नहीं, बल्कि बुद्धि संवर्धन उद्योग केन्द्र नाभि है।
* रोजगार केवल नौकरी नहीं, बल्कि सुरक्षा और सम्मान का करार है, व्यवसाय केवल धन नहीं, बल्कि सेवा और इनकम टैक्स रिटर्न सरकार का आदान-प्रदान का गतिशील प्रवाह है।
* सरल सूत्र मे “तन+ मन+ धन+ बुद्धि+ समय+ संस्कार” ये छह से साठ किलो मीटर तक फैला एक धुरी पर कर “रियल्टी→ रॉयल्टी→ ऊर्जा” का चक्र है।
* सरल सामाजिक संरचना में ऐसे समझा जा सकता है:
* क्षेत्र --- शब्द उद्योग -----परिणाम
* शरीर---- स्वास्थ्य ---- भोजन,योग,ऊर्जा जागृत, शिक्षा अनिवार्य रोज़गार दाता पल मे है।
* घर --- स्वच्छता, अनुशासन, संतुलन, सहमती, सम्भोग, प्रेम ब्रह्मचर्य दोनो कर उद्धार कर्ता है।
* कृषि ---अन्न, वृक्ष, जल, पवन नाभि, समृद्धि शुन्यएक कर दिया है।
* शिक्षा --- ज्ञान, कौशल, आत्मनिर्भरता स्विमिंग पूल पर स्थिर परिपक्व जिवन उर्जा केन्द्र नाभि है।
* व्यवसाय ---- सेवा, विनिमय, यम, रॉयल्टी, संस्कार, सहयोग, सत्य, सामाजिक विवाह नव गृह, आठ शक्ति है।
* यह विचार मुख्य विषय संख्या अनन्त अंक शब्द उद्योग है।
* “हर व्यक्ति उपभोक्ता प्रोसुमर लिडर नही, संभावित उत्पादक ऊर्जा केन्द्र जागृत है।”
* “मुखिया कर्मक्षेत्र” की अवधारणा बनती है।
* परिवार = प्रथम उद्योग इकाई
* आंगन = प्रशिक्षण अध्यात्म विषय संख्या कितनी एक से दस दास है।
* ग्राम = उत्पादन मंडल सहकारिता शाखा अनन्त गुणधारी गुणकारी फल बिज़ संग्रहण मुख वंशावली डिजिटल प्रशिक्षण अध्यात्म है।
* नगर = विनिमय क्षेत्र कर ज्ञान अभाव सम्भोग संपति उत्पन्न करता है।
* राष्ट्र = सामूहिक ऊर्जा नेटवर्क जिवन शैली अधर आधार पर स्थिर ऊर्जा है। ????
* इस व्यवस्थित रूप देना आगे विकसित रूपो किया जा सकता है:→
* “आंगन बागवानी उद्योग नीति”
* “स्वास्थ्य-शिक्षा-कृषि त्रिकोण मॉडल”
* “परिवार आधारित आर्थिक आज़ादी संरचना”
* “रॉयल्टी स्रोत ऊर्जा चक्र”
“मुखि,।,,!नåया कर्मसंहिता”
* अध्यात्म, अर्थशास्त्र और सामाजिक संरचना एक साथ बहते हैं।
* यह विचार कविता भी है, मॉडल भी, और सामाजिक दर्शन का स्वर है।????????????
* हाँ, सरगुजा-अंबिकापुर क्षेत्र में हंडिया/हांड़िया जैसी चावल-आधारित किण्वित पेय परंपरा है, और छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में इसे अलग-अलग नामों और तरीकों से जाना जाता है।
* आज भी कई आदिवासी समुदायों में यह त्योहार, विवाह, सामुदायिक भोज, खेत- खलिहान के श्रम और परंपरागत अतिथि-सत्कार से जुड़ा पेय माना जाता है।
* अब इसका उपयोग जगह-जगह बदल गया है: कहीं यह केवल सांस्कृतिक अवसरों तक सीमित है, कहीं रोज़मर्रा/बाज़ार में भी मिलता है।
* कानून व स्वास्थ्य कारणों से नियंत्रण में है।
* हंडिया भारत के झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश आदि क्षेत्रों में लोकप्रिय चावल-बीयर के रूप में दर्ज है।
"हंडिया क्या है" "?"
* हंडिया मूलतः चावल + पानी + प्राकृतिक स्टार्टर से बनने वाला किण्वित पेय है।
* इसका नाम “हांडी/हंडी” यानी मिट्टी के बर्तन से जुड़ा है।
* यह आसवित शराब नहीं, बल्कि किण्वित पेय है, इसलिए इसे कई जगह “राइस बीयर” कहा जाता है।
* इसमें हल्की खटास, दूधिया रंग और नशीला प्रभाव होता है।
"क्या क्या सामग्री लगती है" ?
* परंपरागत रूप में मुख्य सामग्री होती हैं :→
¡. चावल : सामान्य चावल, कुछ जगह देसी/स्थानीय धान का चावल।
¡¡. रानू / बखर / धुपी : यह प्राकृतिक किण्वक starter culture होता है। कई जगह इसे जड़ी-बूटियों से बनी छोटी गोली या पाउडर के रूप में रखा जाता है।
* स्रोतों : रानू/बखर को 02 से 05 ग्राम पाउडर मे लगभग 21 प्रकार की जड़ी-बूटियों का मिश्रण बताया गया है।
"पानी"
* पीने योग्य साफ़ सुथरा पानी।
* मिट्टी/लकड़ी/धातु का बर्तन।
* परंपरागत काली मिट्टी की हांडी का महत्व है।
'बनाने की प्रक्रिया"
* घरेलु उद्योग सांस्कृतिक/शैक्षणिक पेय रूप मे है।
* कानूनी और स्वास्थ्य कारणों से इसे घर में बनाने की “नाप-तौल वाली रेसिपी” की तरह उपयोग नहीं किया जा सकता हैं।
"परंपरागत प्रक्रिया का सार रस है"
¡. चावल पकाया जाता है।
¡¡. पकाए हुए चावल को ठंडा करते है, उसमें रानू/बखर/धुपी / घास जैसा प्राकृतिक किण्वक मिलाया जाता है।
¡¡¡. मिश्रण को ढककर किसी बर्तन, विशेषकर हांडी में रखा जाता है।
¡v. कुछ दिनों में किण्वन सड़कर तैयार होने पर उसमें पानी मिलाकर, मसलकर/हिलाकर, छानकर पेय रूप में परोसा जाता है।
विभिन्न स्रोतों में हंडिया के लिए उबले चावल को रानू/बखर घास के साथ मिट्टी के बर्तन में किण्वित करने का वर्णन मिलता है।
"कितने दिन में तैयार होता है"
* सामान्यत : गर्मी में: लगभग 02 से 03 दिन
ठंड/बरसात में: लगभग 03 से 05 दिन या कभी-कभी एक सप्ताह तक तापमान जितना गर्म, किण्वन उतना तेज़ होता है।
* कुछ स्रोत 03 से 05 दिन बताते हैं, जबकि पारंपरिक विवरणों में “एक सप्ताह के भीतर” तैयार होने की बात भी आती है।
*“एक रुपए” में कितना बनता था और आज बनता है"
* पुराने समय में “एक रुपए” की कीमत बहुत अलग थी।
* गाँवों में जब चावल घर का, पानी अपना, बर्तन अपना और रानू स्थानीय होता था, तब नकद खर्च बहुत कम पड़ता था।
* इसलिए बुजुर्ग लोग कहते थे कि “एक-दो रुपए में भी हंडिया हांडी भरके बन जाती थी।”
* आज के हिसाब से लागत जगह, चावल की कीमत और रानू/बखर घास की उपलब्धता पर निर्भर करती है, मोटे तौर पर खर्च के घटक हैं :
"खर्च का हिस्सा"
* चावल का प्रकार - मुख्य लागत- रानू/बखर/घास : स्थानीय हो तो कम, खरीदा जाए तो अलग
* पानी/ईंधन : चावल पकाने का समय
* बर्तन/सफाई : सुरक्षा के लिए जरूरी
* इसलिए आज “एक रुपए में” वास्तविक रूप से बनाना कठिन है, लेकिन प्रतीकात्मक अर्थ में इसका मतलब है: यह पेय कभी घर-आंगन की स्वावलंबी परंपरा था, बाजार की बोतल नहीं।
क्या आज भी लोग बनाते और पिलाते हैं?
* हाँ, कई आदिवासी क्षेत्रों में आज भी परंपरा मौजूद है।
* तीन बातें ध्यान रखने योग्य हैं:
¡. सांस्कृतिक पेय: पूजा, विवाह, नाचा-गाना, सामुदायिक भोज में पारंपरिक व्यवस्था है।
¡¡. जीविका: कुछ क्षेत्रों में महिलाएँ इसे बेचकर आय भी कमाती हैं।
¡¡¡. नियमन: शराब/मादक पेय पर राज्य के आबकारी कानून लागू हैं।
¡v. बिना अनुमति बिक्री या व्यावसायिक उत्पादन कानूनी समस्या बनता है।
v. हंडिया कई जगह आदिवासी समुदाय की सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक संबंध और आजीविका से जुड़ा है।
"सावधानी जरूरी है"
* हंडिया परंपरा का विषय है, लेकिन स्वास्थ्य की दृष्टि से सावधानी आवश्यक है।
* गंदे पानी/बर्तन से संक्रमण होता है।
* गलत जड़ी-बूटी या दूषित starter नुकसान करता है।
* अधिक सेवन से नशा, निर्भरता, पेट/लीवर संबंधी समस्या होती है।
* बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बीमार लोगों और दवा लेने वालों के लिए जोखिम भरा अधिक है।
* बेचने या सार्वजनिक रूप से पिलाने में स्थानीय आबकारी कानून लागू होते हैं।
"सारगर्भित निचोड़" ????
* हंडिया आदिवासी जीवन का केवल नशा नहीं, बल्कि चावल, हांडी, जड़ी-बूटी, श्रम, उत्सव और समुदाय का किण्वित इतिहास है।
* सरगुजा-अंबिकापुर की धरती पर यह परंपरा रही है, और कई जगह आज भी जीवित है।
* इसे समझकर, आज संस्कृति के रूप में लिया जा सकता है।
* अंधाधुंध सेवन या अवैध व्यापार के रूप में लिया जाने से देश हित मे नुकसान हो सकता है।• आर्थिक आज़ादी बिज़ शुन्य एक प्रतिशत कर ज्ञान उद्योग राजनीति शासन प्रशासन की अनुमति से देश हित सर्वोपरि वफादार समझदार जानदार श्रद्धालु भक्त शिरोमणि फलदायक है।
* देश राज्य लोकल प्रशासन कि मदद से सौ प्रतिशत शराब बन्दी का प्रजातांत्रिकरण संतुलित जीवन-व्यवस्था क्रॉस रेखा पर स्थिर परिपक्व जिवन शैली अधर आधार है।