प्रकृति-प्रेम दर्शन : ब्रह्मचर्य, कर-ज्ञान और सामाजिक संतुलन का सूक्ष्म विज्ञान
* प्रकृति का मूल स्वभाव संतुलन है—जहाँ जीवन का हर रूप एक-दूसरे को सहारा देता है…
* जब मनुष्य संतुलन को समझता है तो ब्रह्मचर्य, सम्भोग, कर-व्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था जैसे विषय भी प्राकृतिक नियम के शरार के भीतर स्पष्ट होने लगते हैं…
01. प्रकृति-प्रेम ब्रह्मचर्य को जन्म देता है : …
* ब्रह्मचर्य का अर्थ सिर्फ इन्द्रिय-निरोध नहीं, बल्कि चेतना की ऊर्जा का संरक्षण है ; जो व्यक्ति प्रकृति को प्रेम से देखता है, उसका मन स्वभावतः आत्म-अनुशासन को अपनाता है…
* यही प्राकृतिक प्रेम ब्रह्मचर्य का बिज़ बनाता है ; वासना नहीं, बल्कि शुद्धता और संतुलन से जनम का उदय होता है…
02. ‘कर’ बच्चे को जन्म देता है – जिम्मेदारी का सिद्धांत : …
* मानव समाज में कर (Tax) का भाव एक बच्चे की परवरिश है ; कर जो समाज को वापस लौटा कर बच्चे का आजीवन विकास को जन्म देता है ; परंतु यदि कर देते समय ज्ञान (Transparency) नही है, तो कर-दाताओं का ०१अज्ञान शून्य शुन्य एक से धीरे धीरे खत्म हो कर धन्यवाद को भूल जाते है…
* ०१अज्ञान बढ़ता है तो मानव-द्वारा निर्मित व्यवस्था संतुलन मे धीरे धीरे बाह्य और आंतरिक व्यवस्था एक जैसी लगने लगती है…
03. कर देते समय का अज्ञान — व्यवस्था 01 कमजोरी नही जिम्मेदारी है…
* कर लिया दिया जा रहा है ; पर उसे कैसे; कहां कौन कब किसके द्वारा उपभोग किया लिया जा रहा है ; इसका ज्ञान नहीं दिया जा रहा है…
* ज्ञान का मूल कारण होना चाहिए़ जिसका वर्तमान में अभाव है …
* जब तक कर का उपयोग-ज्ञान हर नागरिक को नहीं मिलेगा, तब तक समाज प्राकृतिक न्याय की स्थिति में नहीं आ पाएगी…
04. सम्भोग — प्रकृति प्रेम, विकृति नहीं :- सम्भोग स्वयं में विकृति नहीं, यह जैविक संतुलन और वंश-वृद्धि का प्राकृतिक साधन है…
* विकृति तब जन्म लेती है जब सम्भोग का उद्देश्य प्राकृतिक संतुलन से हटकर इच्छाओं की अति में बदलता है…
* प्रकृति-प्रेम में किया गया सम्भोग धर्म, संतुलन और जीवन-चक्र की पूर्ति करता है…
05. लड़का-लड़की का प्रेम : विवाह से पहले ‘शून्य–सात भार’ का ज्ञान :- विवाह से पहले लड़का-लड़की के प्रेम में अक्सर ‘शून्य-सात भार’ का प्रभाव होता है— अर्थात भावनाओं का भार 07गुना अधिक, और विवेक शून्यएक होता है…
* यह स्थिति प्रकृति में भी देखी जा सकती है : जहाँ आकर्षण बड़े, स्थिरता आचार-विवेक और ०१अ से आती है…
* इसलिए विवाह से पहले थोड़ा कर ०१अज्ञान : अर्थात भावनाओं का कर भार सौन्दर्य केलिए हमेशा प्राकृतिक मानक पर किया गया नेचुरल शोध है , आपने श्रेष्ठ आध्यात्मिक–आधौधिग (क्यूट क्राउन पॉलिटिक्स) कहा है— जहाँ प्रेम की पवित्रता बिकती नहीं, बल्कि प्राकृतिक रूप से स्वत:घटित होती है…
06. बेरोज़गारी मानव-निर्मित है :— प्रकृति में कोई बेरोज़गार नहीं है: प्रकृति मे कोई प्राणी बेरोज़गार नही है सिर्फ़ हवा चलती है, पेड़ बढ़ते हैं, पक्षी उड़ते हैं, नदियाँ बहती हैं— सब अपनी भूमिका निभाते हैं और परस्पर रिटर्न बच्चे पैदा करते है…
* मनुष्य भी— देखना, सुनना, पसंद करना, चलना, बोलना, सिखाना, सीखना, यहाँ तक कि सोना और आराम करना भी शरीर को रिटर्न देता है ; पर मानव-निर्मित व्यवस्था में रिटर्न 0100% समाज कभी नहीं देता है, और सरकाररि व्यवस्था उसमें से अधिकतर रोक लेती है और लगभग 03% लोगों को ही पर्याप्त लाभ मिलता है।यहीं बेरोज़गारी जन्म लेती देती है…
07. निष्कर्ष — ‘कर-प्रेम’ और ‘प्रकृति-प्रेम’ का जेड-00 मॉडल ::…
* जब ब्रह्मचर्य चेतना के साथ , सम्भोग संतुलन के उद्देश्य से आंख से आंख मिलाकर, जिम्मेदारी की पालना से, प्रेम सहमति पवित्रता से जुड़ता है ; तब समाज जेड-00 (Zero Distortion – Zero Exploitation) मॉडल की ओर बढ़ता है…
* जहाँ नवजीवन जिवण बल होश बल, विवेक शुन्य शुन्य एक हो एक समान रिटर्न पर अधर आधार पर आधारित होता है…