बिज़ ज़मीन में, फल-फूल आसमान से क्यों?
बिज़ ज़मीन में, फल-फूल आसमान से क्यों?
(मानव-निर्मित नियम, अध्यात्म-औषधि, शासन-प्रशासन, उद्योग, आत्मनिर्भरता और प्रकृति-प्रेम पर समग्र लेख)
* प्रश्न सरल है, पर उत्तर गहरा है —
* बीज ज़मीन में डलता है, पर फल-फूल आसमान की ओर क्यों बढ़ते हैं…? क्योंकि मन जीवन नीचे सबसे नीचे और दिल सबसे ऊपर आसमान में है…
* ज़मीन अधर आधार है जिस पर बोया जाता है, वही फल शिखर में प्रकट होता है…
* ???? प्रकृति का सिद्धान्त : नीचे पाना, ऊपर से पालना…
* बीज मिट्टी में रहता है — अँधेरा, दबाव, घर्षण सहता स्वयम को खाना पीना सब निचे से उपर उठने कि शक्ति फ़ल बिज़ स्वयं ख़ुद से पाता है…
* सूर्य, वायु, जल और आकाश आपस मे संवाद कर बिज़ को सहयोग करते है, तभी वह अंकुर से निकल कर ऊपर उठता है…
* ???? यही नियम मनुष्य के बिज़ पर भी लागू है…
* ???? मानव-निर्मित नियम में मानव स्वयं के स्वर की शक्ति को भूल के कारण ही कन्फ्यूजन मे सारा जीवन भ्रम में भटकते रहता है…
* मानव ने स्वयम नियम तो बनाए किन्तु दुसरो पर लागु करने के पहले स्वयं पर जिसने लागू किया वह आसमान में उड़ता नज़र आया पर जिसने ख़ुदपर भरोसा नही किया और लागू किया धड़ाम से पानीमें डुबा और मौदान में मर गया …
* प्रशासन • शासन • उद्योग • शिक्षा • अर्थव्यवस्था संचालन योग प्रवेष प्रजातंत्र देश प्रयोग का परीणाम कर है…
* मानव स्वयं का कर भूल गया कि नियम तभी फल देते हैं जब वे प्रकृति-सिद्धान्त के अनुकूल स्वयं ख़ुद को पहले हजम करते हैं फिर दूसरों से फल की उम्मीद सफल होती हैं…
* जब हम ऊपर से फल तोड़ना चाहते हैं और नीचे बीज बोना नहीं चाहते — तब संकट उत्पन्न होता है…
* सोचना जमीन पर है किन्तु कल्पना आसमान से जन्म और फल लेती है फ़िर हक़ीक़त मे ज़मीन पर धैर्यवान को दिखाई देने लगती है…
* ????️ अध्यात्म औषधि : आंतरिक मरम्मत स्वमेव स्वकर्म फल स्वस्थ्य बैलेंस जीवन हैं…
* अध्यात्म कोई पलायन नहीं, यह वह औषधि है — जो मन, विचार, संस्कार और निर्णय को ठीक स्वस्थ करती है…
* जब मन शुद्ध होता है, तो कर्म संतुलित हो कर स्व कर्म से ही शासन, उद्योग, समाज और परिवार से स्वस्थ स्थाई मुख जैसी सरकार पनपती है…
* ???? उद्योग और आत्मनिर्भरता…
* उद्योग का अर्थ केवल फैक्टरी नहीं, शरीर सर्वश्रेष्ठ अनमोल अनेक में एक उद्योग है…
* ऊर्जा = कच्चा माल प्राकृतिक बिज़ बीज फलक के मध्य रोशनी बिचो बीच प्राण जीवन निर्मित काली है…
* श्रम = प्रक्रिया • सेवा = उत्पाद • समाज = बाज़ार • खरीददार= लाभ भुगतान करता स्वयम इन्सान है…
* जब नागरिक स्वयं को उपभोक्ता + उत्पादक (PROSUMER) समझता और ऊर्जा जागृत होती है, तब आत्मनिर्भरता जन्म कर देती है…
* ????️ नागरिक = देह _देशहित का पहरेदार करदाता हक़ीक़त फलदार वृक्ष पैड में छिपा है…
* देश की सुरक्षा केवल सीमा पर नहीं, उस हर जागरूक देहधारी नागरिक के पंच तत्व में है…
* जो स्वेक्षा करदाता सेवा करता है, उत्पादन करता है, और प्रकृति-प्रेम में जीवण व्यतीत करता है — वही सच्चा देशहित पहरेदार प्राणी शेर नही इन्सान है…
* ???? नीचे से ऊपर मन की यात्रा …
* करश्रम, सेवा अध्यात्म दो नयन जब नीचे से ऊपर केन्द्र की ओर उड़ते हैं, तो उनमें घर्षण स्वाभाविक क्रिया कल्पना विस्तार होता है…
* यही घर्षण :•: ऊर्जा को एकत्र करता है,
और परिणाम उत्पन्न करते हुए फल_फ़ल बिज़ बनते हुए ज्ञानगंगा विस्फोट कर रियल्टी रॉयल्टी प्रोसुमर लिडर पहचान है…
* ???? मानव = लाइट हाउस :•: जागरूक इन्सान …स्वयं एक LIGHT HOUSE है …
* अंधेरे में बिना शोर रोशनी फैलाता है और स्वयं स्थिर, स्वयम से दुसरों का मार्गदर्शक बन दिया को बुझने से बचाते हुए रोशनी देता है …
* ✨ निष्कर्ष :•: बीज ज़मीन में इसलिए बोया जाता है ताकि फल पुत्र आसमान से बात कर औरों के जीवन में रोशनी फैला सके और धरा को जीने योग्य कोमल पत्ती से भी जिज्ञासु फूल जन्म ले सके …
* आत्मनिर्भरता की घोषणा खड़े होकर स्वयम शुरू करता है और बिना शोर सम्पूरण आसमान से गुंजरते हुए बिना आग धुंआ छोड़े हक़ीक़त में परिणाम भुमि पर निर्भर फल दिखाई देता है…
* अध्यात्म औषधि, मुख उसका स्वयम शरीर प्रसाद वितरण करदाता स्वयम वसुली सिस्टम इको वातावरण है…
* धरम करम उसका स्वयम पर स्वयम का शासन प्रशासन उद्योग शिष्य शिक्षक प्रयोग करें भक्त शिरोमणि राज दरबार दर्शक हस्ताक्षर ऑटोग्राफ़ सिर्फ़ अनिवार्य नाम राज सिंहासन है…
* शिष्य उद्योग उसका हाथ और नागरिक उसकी आत्म पहचान स्वयम वरदान का प्रतीक झंडा आज है…
* ???? जब मनुष्य प्रकृति-प्रेम सिद्धान्त का अनुसरण करे, तो संपूर्ण ब्रह्माण्ड साकार हो परिणाम-फल मुखवंशावली सौं राष्ट्र घोषित है…
* सम्पूरण जीवन-योग कर निर्भरता ज्ञान मिश्रित रूप स्वयम प्राण प्रिय रसमलाई खानपान दोकर हाथ की सफ़ाई आंतरिक असंतुष्टी दृष्टिकोण परिणाम बिदाई खुद खुदा आज है…