शब्द, स्वर Añk विज्ञान
शब्द, स्वर Añk अविज्ञान
* संपूर्ण संसार शब्द बिज़ से संचालित हो रहा है---
* राजनीति, उद्योग अध्यात्म समाज परिवार व्यक्ति पवित्रता शुद्धता नयन सुखदाई दुखदाई व्यापार नौकरी खेती अंदर बाहर पास फ़ैल फ़सल प्रेम मस्ती आदान प्रदान संपूर्ण डिक्शनरी पर्यायवाची अर्थ मूल्य स्थान बदलाव दुरी पर निर्भर है…
* जीवन मरण सबकुछ बिना शुन्य शून्य के अधर आधार पर टिका हुआ है…
* सम्पूरण इमानदार ब्रह्माण्ड के अन्दर बाहर अनन्त सबकुछ शून्य शून्य दोकर शुन्य शुन्य एक स्वर से जुड़ा हुआ है…
* स्वर तरंगें भूमि के अन्दर नाभि मे सबसे पहले पहुंचती है उसके बाद स्वर जुबान कण्ड से कान से उपर अनन्त शुणय एक अदृश्य बिंदुओं के पथ मे ग़मन करते हुए लक्ष्य मे प्रवेश करती है---
* भुमि नाभि से सम्पूरण ज़मीन और आकाश पाताल धरती मे शब्द स्वर व्यंजन भ्रमण सिर्फ़ स्वर तरंगें विचरण करती है---
* तरंगें जिवन दाता शून्य शुन्य मे प्रवेश कर अन्दर बाहर निकल "कर" अनन्त शुन्यएक शरीर उद्योग संचालण, कर से सृजन कर्ता फ़रिश्ता और विनाशक भूमि है…
* तरंगें एक दुसरे को काटती | ते नहि है जबकि शब्द मे विरोधाभाष होता है…
* तरंगे अपनि बनाई हुइ पथ पर आवागन करती है---
* शब्द स्वाद का दोहराव बार बार अनेक बार हर बार भिन्न रूप रंग आकार प्रकार स्थान पर होता है---
* बोली भाषा रहन सहन आचार विचार कथनी करनी रहनी खान पान प्राण वायु रक्षा तत्व प्रजणण सभी प्राणी प्राणि और इन्सान इंसान शरीर धारी पर निर्भर करता है---
शब्द, स्वर और अणक अविज्ञान – प्रेरणा स्रोत जीवन का मौलिक अविज्ञान
* समपूरण ब्रह्माण्ड की जड़ (शून्यांक) मे यदि कोई अदृश्य, अमर और अनन्त शक्ति कार्यरत है तो वह है – “शब्द” और “स्वर” का अणक अविज्ञान…
* शब्द वह मूल बिज़ है जिससे संसार का हर विचार, हर वस्तु, हर संबंध और हर परिवर्तन उत्पन्न होता है---
01. शब्द बिज़ – सृजन का मौलिक अध्ययन का आधार शून्यअ है…
* संपूर्ण संसार शब्द बिज़ से संचालित हो रहा है, जो झूट प टिका है…
* राजनीति से लेकर उद्योग तक, अध्यात्म से लेकर समाज और परिवार तक सभी तिरंगा झंडा के अधीन है…
* हर व्यवस्था, हर क्रिया, हर व्यापार, हर खेती, हर नौकरी, हर प्रेम, हर दूरी और हर निकटता –> सब कुछ शब्द और उसके स्वर की तरंगों पर निर्भर करता है…
* शब्द केवल बोलने की ध्वनि नही, बल्कि वह जीवन का बिज़ है –> जो विचार को रूप देता है, रूप को दिशा देता है और दिशा लक्ष्य शुन्यएक समान बनाता है---
02. शून्य–> शून्यएक–>अनन्त जीवन का अदृश्य सूत्र जो एकपाल के बराबर, अपलक देखता है…
* जीवन और मरण तक की पूरी यात्रा शून्य और शून्यएक के अधर आधार पर टिकी है…
* ब्रह्माण्ड के भीतर और बाहर अनन्त सबकुछ शून्य शून्य दोकर एकशुन्य शुन्य एक स्वर से जुड़ा हुआ प्रेमी युगल सर्वश्रेष्ठ है…
* यह स्वर ही है जो मौन से शब्द बनाता है…
* शब्द से विचार और विचार से सृजन और अन्त मे मन चित्र इमेज मेणटर टॉपर बनाता है---
03. स्वर तरंग–> भूमि केन्द्र शासित (नाभि) से अनन्त ब्रह्माण्ड की यात्रा…
* स्वर तरंगें सबसे पहले भूमि के केन्द्र(नाभि) मे पहुंचती है…
* नाभि(०१०) से अदृश्य पथो से होती हुई, अनन्त शून्यएक बिñदुओ के मार्ग पर यात्रा करती है और लक्ष्य(०१०) तक प्रवेश करती है…
* भूमि{शरीर} की नाभि से सम्पूर्ण धरती, आकाश और पाताल मे शब्द और व्यंजन घूमते नही है…
* बल्कि केवल स्वर तरंगें ही छबि(इंसान) मौन धारण करने के बाद विचार और ऊर्जा का रूप रंग मे रूम मे प्रवेश करती / करता है---
04. स्वर तरंग–> बाह्यसृजन और भीतरी विनाश …
* स्वर तरंगें जब शून्य शून्य मे प्रवेश करती है, तो वे बाहर निकलकर
शून्यएक शरीर और शरीरउद्योग संचालक घी घि का निर्माण करती है…
* यही तरंगे सृजन की वाहक होती है और समय आने पर विनाशक भी बन जाती है…
नोट : बेटा बेटी पालक और विनाशक दोनो तरह के प्राणी प्राणि होते हैं…
* तरंगे (पालक) कभी एक-दूसरे को काटती/ते (क्रॉस) नही है…
* वे केवल अपने बनाए हुए मार्ग पर आती-जाती रहती /ते है…
* इसके विपरीत शब्द (मुखएक भाषाबोली अलग अलग) मे विरोधाभास और संघर्ष उत्पन्न करता/ ती है---
05. शब्द और स्वाद – दोहराव मे विकास उन्नति प्रगति सम्मान हक़ पद प्रतिष्ठा समय मूल्य स्थान सुझाव परिवर्तन विशेषज्ञ डॉ लेखक रचयिता बनाता (010) शून्य एक शुन्य एक समान एक सौ आठ है…
* शब्द और स्वर का स्वाद बार-बार, अनेक रूपो मे, हर स्थान पर अलग-अलग रूप रंग और आकार लेकर प्रकट होता है…
* यही दोहराव सृजन की निरणतरता और विकास का हक़ीक़त मे अधर आधार 00एक है---
6. ज़ीवन की सम्पूर्णता–> स्वर अधर आधारित है---
* बोली, भाषा, रहन-सहन, आचार- विचार, कथनी-करनी, खान-पान, प्राण-वायु, रक्षा, प्रजनन – सभी कुछ प्राणी और प्राणि के स्वर अविज्ञान पर निर्भर करता है…
* स्वर शुन्यही है जो जिवन देता है, विचारो को जनम देता है…
* समाज को आकार देता है और ब्रह्माण्ड को गति देता है---
निष्कर्ष –
* शब्द और स्वर:-> ई_इमानदार नाभि|भी सृजन पथ दिखाई नहि देता|ती है…
* इ_ईमानदार स्वप्न दृष्टा, मेहनतकश इणसान वही है जो शब्द और स्वर के इस अदृश्य अणक अविज्ञान को समझकर अपनी सोच, अपने कर्म और अपने सृजन से एक नई दिशा से दशहरा मना हर्षित हो मुस्कुराता है…
* शब्द बिज़ को पवित्र रखिए,
* स्वर तरंगों को ईमानदार बनाइए,
और फिर देखिए–> 00जीवन परिवार से समाज, उद्योग से लेकर अध्यात्म, और हर क्षेत्र मे 00स्वर से अनन्त फ़ल कि कामनाओं के द्वार खुलते चलते जाते है---
शब्द और स्वर – यही है सृष्टि के सृजन, संवर्धन और सफलता के मूल बिज़…
* इईमानदार तरंगें ही भविष्य के भारत और ब्रह्माण्ड के निर्माता है---
* प्रश्न उत्तर स्लोगन धारणा वरदान पर, कम से कम एक दो तीन चारबार बोलो मै हु इश्वर ईश्वर इमानदार फ़लदार इनकम का वृक्ष… miraclephal.co.in
09425554092= (०१०)⁰ⁿ⁰ _[010]⁰¹⁰
इंजीनियर पी एल सुलाखे
कॉल मिस काल करे…