शरीर साइकिल की तरह काम करता है :— फलस्वरूप जीवन-चक्र प्राणि है…
* मानव शरीर एक अद्भुत प्राण-वाहन है।
* जिस प्रकार एक साइकिल अपने दो पहियों, स्पोक, चैन और सन्तुलन पर चलती है, ठीक उसी प्रकार शरीर भी प्राण, ऊर्जा, मन और लक्ष्य पर चलता है।
* यही कारण है कि जीवन को “चक्र” कहा गया है और मनुष्य को “प्राणि”—अर्थात प्राण से चलने वाला…।---
01. प्राण-वायु – जीवन की मुख्य शक्ति:- साइकिल में जैसे हवा न हो तो पहिए चल नहीं सकते, उसी प्रकार प्राण-वायु न हो तो शरीर की हर प्रक्रिया रुक जाती है…
* हर स्वांस-प्रस्वांस शरीर में ऊर्जा का प्रवाह करता है…
* प्रति स्वांस, शरीर की प्रत्येक कोशिका को गति देने वाला अदृश्य ईंधन सपना से मिलता है…
* यही प्राण जीवन के “आगे बढ़ने” का प्रथम आधार है…।---
* 02. शून्यदो पहिए :- 01शरीर और 01मन:- साइकिल दो पहियों पर चलती है; जीवन भी दो पहियों पर चलता है:—
* ०१. शरीर (Body) [{तन मन धन बुद्धि समय संस्करण राज़योग} = (आत्मज्ञान, अंतर्मन ज्ञान)]
•०२. मन (Mind):- दोनों का संतुलित होना आवश्यक है… अर्थात मन दूरी ही तन धन बुद्धि समय संस्करण राज़योग आत्मज्ञान अंतर्मन नीति है…
* शरीर ठीक, मन अशांत — तो यात्रा डगमगाती है…
* मन ठीक, शरीर अशक्त — तो गति नहीं मिलती…
* जब दोनों पहिए एक-सी दिशा में घूमते हैं तो जीवन सहज आगे बढ़ता है…।---
* ०३. स्पोक – दिशाएँ और निर्णय :… साइकिल के 030 स्पोक पहिए की मजबूती बढ़ाते हैं,…
* इसी तरह मनुष्य के जीवन में:— 030 प्रकार की दिशाएँ, 030 प्रकार के निर्णय, 030 प्रकार के संस्कार हमारी गति और संतुलन को मजबूत बनाते हैं…
* गलत दिशा = कंपन = गिरावट
* सही दिशा = स्थिरता = उन्नति …!---
* ०४. चैन और लीवर – 02 axial दिशा का सिद्धांत :- साइकिल की गति चैन लीवर से आगे पिछे बढ़ती है …
* जब पाँव दो axial दिशाओं में बल लगाते हैं—
तभी पहिया गति पकड़ता है…
* मानव जीवन में ये दो अक्ष हैं:-
* ०१. कर्म अक्ष • ०२. धर्म अक्ष
* जब कर्म और धर्म दोनों में सही शक्ति लगती है, तभी जीवन-चक्र आगे बढ़ता है…!---
* 05. मध्य-संतुलन – जीवन की वास्तविक गति :- साइकिल की पूरी गति उसके मध्य-धुरी पर निर्भर है…
* धुरी ही पहिए को सही दिशा देती है…
* इसी तरह मनुष्य के जीवन की धुरी है :—>
* संतुलन • संयम • सतत ऊर्जा
* जितना मध्य स्थिर होगा, उतनी जीवन-गति सुचारू होगी…!---
* 06. गति और दूरी :– लक्ष्य का निर्धारण :-
* साइकिल जितनी तेज, उतनी जल्दी मंज़िल;
शरीर जितना ऊर्जावान, उतनी जल्दी लक्ष्य…
* गति = प्राण + अनुशासन ±०१लक्ष्य
* दूरी = संकल्प + निरंतरता ±००१लीवर लंबाई ±03Ñ0KMÑ…
* लक्ष्य इच्छा से नहीं मिलता, लक्ष्य नियमित गति से मिलता है…।---
* निष्कर्ष :- मानव शरीर वास्तव में एक जीवित साइकिल है…
* प्राण उसकी हवा है, मन-शरीर उसके दो पहिए, संस्कार उसके स्पोक, कर्म व धर्म उसकी चैन-लीवर, और संतुलन उसकी धुरी…
* इसलिए मानव को प्राणि कहा गया है :—
क्योंकि वह प्राण-ऊर्जा से चलने वाला चक्र है…
* जब प्राण, मन, शरीर और लक्ष्य एक सूत्र में बंधते हैं, तो जीवन एक सहज, संतुलित और सफल यात्रा प्रारंभ कर पूर्ण जोश पर कम शब्दों पर मंजिल मिल जाती है…।---
* शरीर प्राण की Cycle है जिसके 03 बिन्दु 01 ज़मीन कि लाइन में होते हैं ; जबकि 03 बिन्दु चालक के उर्ध्राकार में मलमूत्र नाभि और थ्रोट रीढ़ की लाइन को 090 डिग्री जंकशन पर मिलते है…