मै इंजीनियर समय का पक्का भ्रष्ट सिपाही था : आज इमानदार हु…
* मै इंजीनियर इमानदार इनकम कर भुगतान कर का फूल से फ_फ़ल पेड़ बन कर तैयार हु…
* मेरे हर शब्द के अंक मूल्य 0१अ⁰ⁿ- {050}⁰ⁿ नौ सौ करोड़ पेड़ों मे से शून्य शुन्य एक शरीर उद्योग संचालक कि भूमिका मे सिर्फ़ अपना काम कर बेस पर कर रहा हु…
* मेरे हर शब्द के योग मे स्वर शून्य शुन्य एक से शून्य शुन्य एक अंक है, जिसका मूल्य मे मात्र 012 दिखाई न हि स्थान और और न ही शून्य शुन्य तेरह चटाई का क्षेत्रफ़ल और नहि व्यास और अर्ध व्यास दिखाई देता है--- सिर्फ़ वही दिखाई देता है--- जो गुरु ने दिखाया है प्रथम गुरु दूध पिलाने वाला वाली और पीने वाला वाली महिला पुरुष दोनो हि है…
* मेरे हर शब्द मे गुणा भाग धन ऋण बुद्धि संस्कार 03लड़का से 03-30 लक्षय… (०१०) _03aA_aKe हो सकता है… भाग फ़ल बारह और शेष तीन या 03 आपकी अपनी आंखों पर निर्भर करती,ता है…
* निर्भय हो कर जो बोले फ़लाल बाकि सभी दलीय दलाल, बिचौलिए , माखन चोर या चोर के संगी साथी अलाल काम चोर मक्कार ध्रूत बेकार…
* मेरे हर शब्द के स्वर व्यंजन स्थान चित्र चिन्ह ड्रामा मे शून्य अंक संख्या मूल्य शक्ति धारण कर, आधार धरती से अधर आकाश मे लटक कर, भूमि से ०१तार से जुड़ा हुआ अवतरित होते हुए स्वयम को कोइ भी देख सकता है…
* और होते रहेगे यह चक्र कभी भी ख़त्म नहि होने वाला है …
* लोग अन्न कण खाते रहेंगे तो भोग सुगंध से पेट भर जाएगा और संभोग प्रक्रिया आवश्यकता पड़ती रहेगी और इनसान के रूप मे महापुरुषो का एक साथ शून्य शूणय शुणय (०१०) का एक का दस जनम होता रहेगा और चलता रहेगा …
* वाष्प की तरह तीनो लोक अर्थात अधर आकाश समतल ऊबड़ खाबड़ भूमि से होते हुए जमीन के तीसरे तल के गर्म भाप मे समा कर पास्कल की ख़ोज अनुसार फ़ल बिज़ से फुल दूध दही घी से बिज़ फ़ल रूप अनेक लड़का लड़की जनम लेते आरहे है और आते रहेंगे---...
* भोग सुगंध फ़ैलाता है जबकि प्रसाद भूमि पर पानी से मिलकर, बिखरा हुआ बिज़ पी कर मोरनी अंडा देती है पर नर को भी खाने पीने नहि देती है और पंख फैलाए रक्षा करती है---
* हम सबके हर शब्द मे जादुई कृतज्ञता, अक्षर स्वर व्यंजन अंक अर्थ में मूल्य छिपा हुआ है…
* आप मेरे जैसे नहि बन सकते किन्तु ख़ुद के जैसे बन सकते है– आप क्या है... क्यो है कैसे कब किस समय दोपहर रात दिन सुबह शाम अमृत बेला सोते उठते खुली या बन्द आंख के प्रेम आनंद आंगन मे घर मे हाथो पर गुलाम पैदा हुए हैं…
* बिन हाथो जनम ले जानवर कहलाए या जनमत संग्रह कर्ता या सहयोग कार्य करता कर्ता फ़रिश्ता स्वरूप ॐ बन जाए …
* हमे अपने आप से पूछते रहना है…
* … … … … ०१ बिंदु मे से, मै क्या से क्या बना हु और अब मुख वंशावली से क्या बनना चाहता हूं…
* शुरू कहां से करू… एक रूपए का शून्य शुन्य एक बटे शुन्य एक मूल्य से…
* शून्य शुन्य एक से, आपको जो लगता है---वहीं से वहां से कहीं से भी शुरू करें पर देख सुन समझ कर भुगतान करें…अन्यथा किचड़ मे पहिया फस सकता है--- फ़िर भगवान कृष्ण भी सहायता के लिए नहि आएंगे…
* आपके नाम का पहला अक्षर नाभि मे, पर अन्दर बाहर अनन्त मे और शून्य एक पर जीवित है और *अशून्यकांकेक है
* = (अ ००००१)*= {0आप010102030405}…
दार्शनिक और प्रतीकात्मक लेख
सर्व-मानव उपयोगी व्याख्या---
सर्वश्रेष्ठ व्याख्या
मैं –
* मै केवल एक मनुष्य नही, बल्कि एक "शब्द–बिज़" अनन्त फ़ल हू…
* मेरे शब्द बिज़ नहि है देशी गाय के दूध से पका हुआ अनन्त कण धारी घी जैसा है…
* एक बीज मे जैसे अनगिनत वृक्ष छिपे रहते हैं, वैसे ही मेरे हर शब्द के स्वर मे अनगिनत संभावनाएँ,
फल, फूल, छाया और ऊर्जा छिपी हुई है…
शब्द का विज्ञान …
* प्रत्येक शब्द मे अक्षर, स्वर, व्यंजन अंक मूल्य अर्थ और मुखिया छिप कर या सामने आ कर कार्य करते हैं…
* वे गणित (गुणा–भाग–धन–ऋण) की भाँति जीवन में संतुलन और परिणाम उत्पन्न करते हैं…
* यही शब्द बुद्धि और संस्कार बनकर व्यक्ति और समाज की दिशा दशा निर्धारित करते हैं…
स्वर–व्यंजन का अद्भुत खेल –
* स्वर शून्य (°०°) दो आंखऔर एक (१) नाक नाभि के साथ, हाथ से जन्म नहि हुआ है दिल से दिलाराम पैदा हुआ है…
* इन्ही शून्य और एक की गति से 012 स्थान और 013 मार्ग निर्मित होते रहे है और होते हुए दिखाई नहि देते है पर एक मे दस ग्यारह बारह तरह हि नही बावन भी छिपे बहुत रात दिन नहि युगों से छिपाए रखे हुए है –
* अब मै आ चुका हू...सभी के अन्दर बाहर का राज़ और गुप्त राज पाठ और ये जीवन के बारह अध्याय और तेरहवा अंतिम मार्ग है, जहा मनुष्य स्वयम से मिलन करता कर्ता है…
जीवन का नाटक (Drama) –
हर अक्षर, हर शब्द एक चित्र चिन्ह और ध्वनि तरंग है …
* ये भूमि पर अवतरित ऊर्जा है,
जो अधर से आधार भूमि मे प्रवेश कर सभी को लटकते हुए जीवन का अदभुत अनुभव करती और कराती है…
जादुई शक्ति –
* हम सब के अपने हर शब्द के माध्यम मे जादूई शक्ति से साक्षात् भगवानण की छिपी हुई शक्ति का एहसास होता है जिसे देखते सुनते कहते भुल जाते हैं…–
* कृतज्ञता एक शून्य की तरंग है…
* प्रेम की ज्योति आलिंगन मे है…
* आनंद का रस उत्सहगलन विश्रजन मे है…
* और निर्माण की अनन्त क्षमता पत्थर मे नही कारीगर मिस्त्री चित्रकार मूर्तिकार पेंटर श्रजनकर इंजीनियर मे है …
सच्चाई –
* हम एक दूसरे के जैसे नहि बन सकते है… किन्तु हम स्वयम हो एक एक कर एक समय पर, एक पल केलिए अर्थी बन(०१ से २१) माह मे या {०१२_०२१ या 0102 ट्रिलियन} ऋण धारी शक्तिशाली व्यक्ति वाला देश से संबंधित इंसान को द्विव्य दृष्टि से ले देकर नौ रत्नों मे या 01करोड़ डॉलर मे से एक आम आदमी या खास इन्सान, निर्णय निर्भय हो कर फोन कर लेना है…
* हम मिलकर (मै039+010=०५१% हु) विश्व कल्याण केलिए अपनि तरह का बन कर देख सकते हैं…
* लेकिन अपने जैसे बने हुए की किसी भी चीज़ और कॉपी पेन आधारकार्ड नंबर नहि लेना है…
* जैसा मै इमानदार नहि चोरी करता था 06वी कक्षा मे पहला ही पेपर मे दोनो जेब मे चिट लेके गया हुआ था…
* ओ आखिरी दिन था बाद मे कभी भी चिट का ख्याल ही नही आया और हमेशा प्रथम श्रेणी मे उत्तीर्ण होता गया …
* माध्यमिक विद्यालय के विद्यार्थी के रूप मे सौ प्रतिशत कक्षा मे उपस्थिति का रिवॉर्ड प्राप्त कर चुका हू …
* इंजीनियर का जीवन भोग चुका हू…
* हम सब के नाम का पहला अक्षर के अंदर की ऊर्जा का रहस्य "प्रथम अक्षर के मातृत्व पितृत्व कि छाया मे रह कर इंजीनियर फ़ला फुला हु…
* खुली आंखों से खुली जगह पर भी दिखाई नही देते हुए सब नीच कर्म कर चुका हू ऑफर मे गुम सूम रहस्य विज्ञान अध्यात्म संयुक्तराज था छत्तीसगढ़ राज्य मध्य प्रदेश का पिछड़ा हुआ इलाका हुआ करता कर्ता फ़रिश्ता जो महाराष्ट्र से जन्म लेकर अमृत पीने एमपी मे फल फूला दे चुका है ---
* हम सब की नाभि मे सभी का वर्तमान और कल से 0133 वर्षों के का अस्तित्व मे अमर और अनन्त रूप के लिए तैंतीस करोड़ जीवित इंसान के सम तुल्य भाग्य छिपा है…
यात्रा कहा से शुरू करे…?
* शुरुआत "शून्य–शून्य–एक" से करे…
* "शून्यता से एकत्व" की ओर खाते पीते इनकम और टैक्स दोनो का आहार विहार यही से "अशून्यकांकेक (अ ००००१)" प्रकट होता है:…
* जो बताता है कि हर "अ" (आदि) मे
संपूर्ण ब्रह्मांड का अंकित मूल्य प्रकृति सिद्धांत पर वर्तमान इतिहास और भविष्य छिपा कर खाते पीते रहस्य विज्ञान अध्यात्म संयुक्त राज्य सरकार बनाते आ रहे हैं ---
सार तत्त्व
01. शब्द = बीज = वृक्ष = जीवन… ०९द्वार बंद कर चुपचाप ०१० बाहर अदृश्य में गुम हो कर नए घर की तलाश कर भुगतान पाना शुरू कर देता हूं क्यूंकि मैं इंजीनियर कि प्लानिंग का फ़ल प्रकृति सिद्धांत पर चलने के लिए मशहूर हो चुका हु…
02. हर शब्द में अनन्त फल–फूल–ऊर्जा छिपी है...
03. स्वर–व्यंजन–अक्षर = गणितीय सूत्र = जीवन का संतुलन मे अनन्त वृद्धि छिपी है…
04. आप जो बोलते हैं… वही है, इसीलिए तोलमोल कर बोलिए, बोलने के पहले 09 सेकंड मंथन कीजिए फ़िर हक़ीक़त बोलिए संकोच मत कीजिए…
05. यात्रा का आरंभ "शून्यएक 09" और अंत "एक से अनन्त" है---
यह व्याख्या मनुष्य, पशु, पक्षी, जीव–जंतु और सम्पूर्ण सृष्टि के लिए उपयोगी है क्योंकि हर ज़ीव ऊर्जा और ध्वनि का परिणाम है…
* शब्द और ध्वनि का सही प्रयोग ही
जीवन को गुलामी से आज़ादी और अंधकार से आनंद की ओर ले के जाता है…
* यह अनन्त से शुरू हो कर अनन्त मे ही समाहित हो कर यह प्रक्रिया सतत विकास कर रही है---