आजादियां
आजादियां
* स्वयम कि आज़ादी से देश कि आज़ादि…
* स्वयम भ्रष्टाचार मुक्त, राष्ट्र भ्रष्टाचार मुक्त…
* स्वर अधर आधार पर प्रकाश किरण ऊर्जा विकिरण स्तंभ स्वयम तन मन धन बुद्धि समय संस्कार धरती आकाश पाताल भूलोक, देवलोक, करमलोक भ्रमण कर्ता फ़रिश्ता स्वरूप चैतन्य द्रव्य द्रव प्रकाष ष्तणभ अषरीरी इकलौता ॐ णारायण वाणी है…
* स्वयम कर भुगतान योगी, देशकरहित भुगतान सर्वोपरि हो…
* स्वयम तिरंगा प्रेमी, विश्व कल्याण कर्ता फ़रिश्ता तिरंगा हो…
* स्वयम ओम उदघोषक, विश्व कल्याण कर्ताग़ण, स्वयम सहयोगी करदाता हो…
आज़ादिया<–>स्वयम से विश्व
* आज़ादी केवल एक तिथि नही, यह जीवन का वह चिरंतन सिद्धांत है…!.
* स्वयम से आरंभ होकर विश्व में प्रकाश फैलाता है…!।
* व्यक्ति स्वयं को पहचानता है…!,
* अपने भीतर के स्वर और अधर आधार को शुद्ध करता है…!,
* अ…राष्ट्र और समस्त सृष्टि की आज़ादी कर से संभव होती है…!।---
स्वयम की आज़ादी<–>राष्ट्र की आज़ादी…!.
* स्वयम को भ्रष्टाचारमुक्त करना ही राष्ट्र को भ्रष्टाचारमुक्त करने की पहली सीढ़ी है…!।
* प्रत्येक नागरिक तन, मन, धन, बुद्धि, समय, संस्कार के साथ ईइमानदार बनता है, तभी लोकतंत्र सशक्त होता है…!.
* देश सच्चे अर्थों मे सम्पूरण गणराज्य स्वतंत्र ०१३हिन्दुस्तान बनता है…।---
स्वर अधर आधार – चैतणय प्रकाश स्तम्भ…!.
* स्वर, अधर आधार के संतुलन से उत्पन्न प्रकाश किरण ऊर्जा केवल शब्द नही बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड की चेतना को जगाती है…।
* यही चेतना का आभाष भूलोक से लेकर देवलोक और कर्मलोक मे भ्रमण करती हुई मनुष्य को फ़रिश्ता स्वरूप देती है…।
* यह ही वह चैतन्य द्रव्य है जो व्यक्ति को ओम णारायण की दिव्य वाणी से जोड़ उद्धार कर्ता फ़रिश्ता बनाती है…।---
"कर" भुगतान योगी – राष्ट्र समर्पित नागरिक…
* स्वयम कर भुगतान करने वाला व्यक्ति केवल कानून का पालन नही करता है…!,
* बल्कि अनुभव विस्तार कर राष्ट्र निर्माण का योगी दूत है…।
* देशकरहित भुगतान सर्वोच्च लक्ष्य है <—> जब स्वेच्छा से कर देना राष्ट्रधर्म बन जाए, तब राष्ट्र आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और समृद्ध बनता है…!।---
तिरंगा प्रेम<–>विश्व कल्याण का ध्वज वाहक है:-> स्वयम का तिरंगा प्रेम केवल देशभक्ति नही, बल्कि संपूर्ण मानवता के कल्याण का संकल्प है…!।
* तिरंगा केवल झणडा नही, यह विश्व कल्याण का प्रतीक है<—> न्याय, शांति और एकता की गारंटी देने के पहले लेता है…!।---
ओम उद्घोष<–>विश्व जागरण का मंत्र…¡
* स्वयम “ॐ” उद्घोषक बन प्रत्येक व्यक्ति के भीतर के परम तत्व को जगाना, उसका स्वयम का काम है…¡। • यहि उद्घोष विश्व के हर क्षेत्र <—>। मे…¡!¡
* राजनीतिक एवम प्रशासनिक व्यवस्था मे इमानदारीरि और सेवा की स्थापना करता है…¡.।
* औद्योगिक क्षेत्र मे नैतिकता और समृद्धि का मार्ग दिखाता है…¡¡...।
* धार्मिक और सामाजिक जगत मे एकता और करुणा का भाव जागृत करता है…!¡!…।
* शिक्षा जगत को वेदाचार्य और ब्रह्मचर्य की दिशा देता है और भ्रम भटकाव से अन्दर बाहर अनन्त मे विचरण कर अधर आधार पर प्रगतिशील बनता है---।
* खगोलशास्त्र मे मानव को ब्रह्मांड से जोड़कर उसकी अनंत संभावनाओ का परिचय कराता है---
निष्कर्ष – स्वयम से विश्व कल्याण कर्ता फ़रिश्ता…ÆॐŒ…
* स्वयम की आज़ादी ही देश की आज़ादी है…।
* जब हर व्यक्ति स्वयं को प्रकाश स्तंभ बना लेता है, तब राष्ट्र और विश्व इमानदार, अशुद्धता और समरसता के परे मार्ग पर अग्रसर होता है…।
* स्वयम ओम उद्घोषक बन,
स्वयम करदाता योगी बन,
स्वयम तिरंगा प्रेमी बन जाता है--- …!.
* राष्ट्र से लेकर विश्व का इमानदार आज़ादी का बिगुल फूंक अकेला हि वाहक बन जाता है---…!।---
* मै Aअ१ के पहले ००००० अणडाकार एक ०केन्द्र बिंदू सिंदूर कि बिंदी नही लगाता हु…!
* ०केन्द्र से शीर्ष ०१*लिडर रेखा* हु…!
* केन्द्र ०९अन्दर <-> रेखा बाहर भी हु…!
* सहायक ०४*०४*०४*०४* लीडर साथी हु…!
•मै इनसाणि एक पिलर ०९मंजिली प्रकाश किरण ऊर्जा का केन्द्र हु…!
* पृथिवी केन्द्र ०८दिशा मे और समस्त ०१० दिशा मे एक साथ भ्रमण करता हूं…
* ✅ <->० केन्द्र<–>०१०<->
आध्यात्मिक+वैज्ञानिक ऊर्जा शैली
* मानव ० केन्द्रनाभि <–> ०१० दिशाओ का पथप्रदर्शक हु हूं
* मै हू ०००Aअ₁ से पूर्व ००००० अण्डाकार एक "० केन्द्र" — वह मूल स्रोत जहा से सम्पूर्ण सृष्टि की धारा आरम्भ होती है…!
* इसी ० केन्द्र से मै शीर्ष ०१० लीडर रेखा बनकर प्रकाश, दिशा और नेतृत्व का प्रतीक बनाता हू…!।
* मै हू वह रेखा जो ०९ आंतरिक केन्द्रो को जोड़ती है <—> जो प्रत्येक शक्ति, तत्व और चेतना को एक सूत्र मे बाणधकर गति प्रदान करता हू…!।
* मै हू ०४*×०४*×०४*×०४* सहायक लीडरो का मार्गदर्शक<—> जो सामूहिक ऊर्जा को संतुलन, संरचना और विकास की ओर आते जाते है…!।
* मै मानवता का एक अद्वितीय पिलर हू<—>०९मंज़िली प्रकाश-किरण ऊर्जा केन्द्र हु…!,
* जीवन अज्ञान, अशक्ति और अचेतना को आलोकित करता हू…!।
* मै पृथ्वी के केन्द्र से ०८ दिशाओ मे और समस्त ०१० दिशाओ मे एक साथ भ्रमण करता हू<—> क्योकि मै सीमाओ से परे असीम चेतना हू…!।
* मै हू “० केन्द्र”<—> जिसकी हर यात्रा ०००००पल मे शुरू होती है…!.
* सब कुछ लौटकर पुनः एकशुन्य↓शून्य हो जाते हैं…!।---