कर से प्राणि | णी का "कर" रहस्य और "कर" से आर्थिक आजादी
शीर्षक: “कर से प्राणि | णी का "कर" रहस्य और "कर" से आर्थिक आजादी”
प्रथम स्लाइड – परिचय
पृष्ठभूमि: सूर्य पुत्र श्रवण
विषय: “जि|जीवन केवल जन्म नही, चेतना का कर-मि|मीलन Xx√Yy है…”
* मनुष्य शून्य शुन्य एक संचार सांचा 02निर्माण एकसाथ तब होता है जब सांचा और प्राणि√णी शरीर कर्म और करुणा का संगम होता है…
* कर-मिलन से प्राणि इन्सान स्वर के साथ दो हाथो मे जनम लेता है…
* प्राणी जानवर भी दोसांचा के साथ वृद्धि करते हुए ज़मीन पर शुणय एक दो तीन चार …12 नाग | माह मे बारह खरगोस जनम लेते है …
* यह क्रिया प्रतिक्रिया प्राकृतिक एवम् नैसर्गिक जीवन की गति और जागृति का प्रतीक है…
दूसरी स्लाइड – जीवन का द्वंद्व
पृष्ठभूमि :-
* दो हाथ – एक अमीर, एक गरीब दोनो शून्य एक विचार है : -
* “गरीब-अमीर दोनो तरह के प्राणी √ णि जन्म लेते हैं…
* शरीर ऊर्जा छोड़मृत्यु उपरांत ज़मीन मे हि समाहित होते है…
* इन्सान वही है जो अपना शून्य और एक शुन्य को जानता है…”
* इन्सान शू|शुन्य का अर्थ जानता है और ००ज़मीन से जुडी विनम्रता का भाव और एक का अर्थ दो आंख से देखकर अनुमान लगाता है …
* मनुष्य की एक दृष्टि दो आंख सिर्फ़ प्रकृति या मानव निर्मित प्रकाश किरण ऊर्जा मे जीवन को सफ़ल बनाती है…
* अस्तित्व अर्थात् स्वर व्यंजन अंक मूल्य शब्दधारी चिन्ह की पहचान कर्ता और नामधारी जीवित इंसान, पीपल के पेड़ समान वृक्ष फ़ल बिज़ है…
* जानवर प्राणी खुली आंखों से रोशनी या बिना रोशनी पवित्र सम्भोग रात मे नही करते है…
* संभोग क्रिया जिवन दाता है किणतु मनुष्य बन्द आंख से (घी) कर भुगतान करता है और खुली आंख के साथ बन्द आंख के साथ अन्धा पैदा होता है...
* इन्सान अपनी खुली आंखों से दिखाई देने वाली स्थिति, अक्षर स्वर व्यंजन, मात्रा लंबाई चौड़ाई ऊंचाई अलग अलग देती है किन्तु क्षेत्रफल और व्यास और मूल्य वॉल्यूम दिखाई नहि देता है …
* किन्तु पर्दे के पीछे छुपी हुई चीजों को मन की आंखों से देख कर जी ललचाते जीवन मे भोग प्रसाद संस्कार अमृत जल कण गृहण करने के बाद भी अभोगा बना रहता है…
* जबकी जानवर अंधकार मे भी स्वयंम रख अपनी आंख की रोशनी के सहारे चलता फ़िरता है किन्तु रात्रि अंधकार मे सम्भोग की कमाना करता नही है और कर चुकता नहीं करता है…
* जानवर जलचर नभचर सभी पशु पक्षी मादा प्राणी नर से कर पाने हेतु आकर्षित करने केलिए रज़ गन्ध का प्रयोग करती है---
* जो इंसान शु | शून्य-एक कर के सिद्धांत को समझता और जानते बुझते देखते महसूस करता है, वही वास्तव मे कर भुगतान कर्ता फ़रिश्ता ॐ, कर मूल्य इन्सान हि समझता है…
तीसरी स्लाइड – ज्ञान और अज्ञान का भेद :-
* पृष्ठभूमि : एक खुली पुस्तक और उसके ऊपर प्रकाश की किरण ✨ विचार:-
* “नर और मादा जो अक्षर, अंक, बीज और मूल तत्व को नही पहचानता, वह केवल जीव है — चेतना नही…”
* संयुक्त शब्दज्ञान मनुष्य को पशु निशाचर भेड़ बकरी चराए वनवासी की तरह डुप्लीकेटर बनाता है…
* शू|शुन्य एक ब्रम्ह अज्ञान इन्सान को देवत्व की दिशा मे ज़मीन के ऊपर तितली के समान उडाती है…
चौथी स्लाइड – आत्मबोध का रहस्य : -
* पृष्ठभूमि: एक व्यक्ति ध्यान मुद्रा मे, हृदय से प्रकाश निकलता हुआ विचार:-
* “इमानदार कर दाता अपने जन्म का राज़ जानता है, वही ‘दिलवाला दिलाराम’ बन अन्य को बनने मे सहयोग करता है…।”
* आजका इमानदार कर दाता स्वयम को नहि जानता है कि वह दस मुख वाला कर आदान प्रदान से बना प्राणि है— और उसके भीतर शिवशक्ति की भक्ति|क्ती, करुणा व रात|दिन के प्रेम की माधुर्यता भरी है पर कन्फ्यूज़ है, परन्तु असंतुष्ट दिखाई देते है…
पाचवी स्लाइड – जीवन का उद्देश्य :-
* पृष्ठभूमि : ब्रज, वन, गंगा तट जैसा दिव्य शांत वातावरण
• विचार:- “इमानदार करदाता वनवासी नही, विवेकहीन है...
• ब्रजवासी कृष्ण नही, भाव विहिन है…।”
• मनुष्य अपने कर्म, वचन और विचार से काफ़ी का हक़दार है किन्तु सम्पूरण कर्मफल का अधिकारी प्रकृति सिद्धांत पर है किन्तु मानव नियम पर दस से बीस प्रतिशत पाता है बाकी कर भुगतान मे चले जाता है---किन्तु दिखाई नहि देता है---…
अंतिम स्लाइड – निष्कर्ष :-
* पृष्ठभूमि : उगते सूर्य के साथ फैलती रोशनी ☀️
* विचार:-
* “कर (कर्म) और मिलन (सहयोग) का भाव ही मनुष्य को पशु से देवत्व की ओर लेके "कर" जाता है…”
* जो इन्सान अपने भीतर के शु|शून्य एक से पाच का रहस्य जानता है, वही जीवन का अमृत पीता है…
• और संसार के लिए प्रेरणा का ज्वलंत सुलगता हुआ दीप समान बनता है…
✍️ उद्धरण – प्रेरणा सूत्र
“मनुष्य तब तक प्राणि नही है, जब तक वह करुणा और करम के सणगम पर, करज्ञान को नहि जानता और समझता है।” —इंजीनियर फागूलाल सुलाखे
* कर (घी)वासना पर नहि — नाम वासना पर आधारित "दोकर" से आर्थिक आज़ादी मिलि है…
* मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल भौतिक सुख-सुविधा का उपभोग करना नही है…
* बल्कि प्रकृति सिद्धांत के अनुरूप सार्थक और राष्ट्रीय उत्थान कर्ता फ़रिश्ता बनना है…
* कर निर्भर बनना और बनाना प्रकृति सिद्धांत है…
* इमानदार कर कण अन्न खा पीकर, वीर्य [wrblood]{wbc|rbc} निर्माण कर, ऊर्जा विकिरण कर्ता फ़रिश्ता ॐ परमेश्वर स्वर है...
* आज समाज का 001% समुह छोटासा वर्ग “करवासना” (Tax Desire) मे फसा लि|लीडर है…
* 099% मानव नियम पर "कर" PAID आश्रित जीवन जी रहे है…
* स्वार्थ की अर्थी और लोभ के अर्थ मे फसा हुआ इन्सान, पशु निशाचर भेड़ बकरी के समान जीवन जी रहे है…
* अधिकारी करदाता ने जनता को उलझा कर, मणत्रि को घी खिला पिलाकर मूल्यविहिन अरबपति बनते हैं…
* कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर को अनपढ़ सीएम पीएम बन चमका रहे हैं …
* शिक्षित बेईमान इन्सान दोशून्य कर ज्ञान लेनादेना नही चाहते है…
* अशिक्षित बेईमान दोशून्य एककर बचत करने मे उद्योग पतियो को सहयोग कर रहे है…
* उद्योगपति बचत करने कि नइ नई सूक्ष्म रीती अंधेरे मे तीर फैंक प्रकाश किरण की तरह गणना मे घोटाला करते हैं …
* टाइम हि दौलत(मणि) है, प्रकृति सिद्धांत अनुसार कर भुगतान का असल सिद्धांत है…
* इमानदार इन्सान चहल कदमी कर निंद्राशन मे भी टाइम का सदुपयोग करता है …
* जबकि बेईमान बिना ब्याज खाए पिए कर का आनन्द लेता है…
* जबकि प्रकृति सिद्धांत कहता है कि “जो छोटासा कर देता है, वही आगेका बड़ा कर भुगतान दाता है…”
* कर वासना सतह विहिन है जबकि नाम वासना प्राकृतिक है…
* कर वासना स्वामि स्वार्थ, भय और दिखावे के मकड़जाल, लालच मे फ़सा कर, लिया दियागया कर सबसे बड़ा दुष्कृत्य है…
* नाम वासना कर वास्तव मे अपने स्वनाम (असली आत्मा कि पहचान) के प्रति जागरूक होना है…
* इमानदार करदाता समाज और राष्ट्र हितैषी द्वार पर करभुगतान ज्ञान विज्ञान अध्यात्म मे से, 005% करदाता राष्ट्रहितैसी योगदान है…
* नाम वासना पर चलने वाला व्यक्ति, कर को बोझ नही, बल्कि अपने आपको कर्तव्यनिष्ट मानता है…।
* इमानदार समझदार करदाता कृषक कृष्ण समान होता है…
• “ सिर्फ़ कर देना ही नही है, बल्कि कर्मकर फ़र्ज़ समझना और निभाना भी धरम है…
* करदान नही, यह देश-धरम का प्रमाण देहधारी है…”
* लक्ष्यधारी मूल्यवान इमानदार करदाता ऐसा व्यक्ति है जो –
स्व-नाम का अर्थ समझता समझाते घूमते फिरते स्वनाम स्वर हि जिवन परिवर्तन विशेषज्ञ डॉ है… :
* करज्ञानदाता जानता है कि उसका अपना नाम केवल पहचान कर्ता नही, बल्कि कर्तव्य का संकल्प दाता है…
* प्रकृति सिद्धांत इंसान के साथ चलता है :- प्रकृति बिज़ लेती है और ॐ नाम फ़ल स्वर जरूरत से ज्यादा अधर आधार पर नौसौव करोड़ को खिलाती पिलाती है…
* मनुष्य मे देने की आदत जनम के पहले से विद्यमान है…
* शिवभगवान एक शु-शून्य ज्ञान मार्ग मे 'अक्षर' बिज़ है…
* मानव ज्ञान विज्ञान अध्यात्म के अनुसार 'शब्द' फ़ल बिज़ की तरह कार्य करता है…
* करज्ञान सहयोग करता है और वह कर-भुगतान को राष्ट्र की उन्नति का साधन माध्यम मानता है…
* स्वनाम-स्वर परिवर्तन करता है :- “मै” से “हम” की दिशा मे आगे बढ़ते हुए अपनी चेतना को व्यापक बनाता है…
परिणाम – आर्थिक आज़ादी की दिशा: -
* जब हर नागरिक स्वनाम के स्वर अक्षर शक्ति पर, कर भुगतान करता है —तब
* इमानदार, निष्ठावान और आत्मभाव से कर वसूली नहि, बल्की कर भुगतान प्रेरणा स्रोत बनता है…
* राष्ट्र विदेशी कर्ज से मुक्त, स्वावलंबी इंसान, और आर्थिक रूप से स्वतंत्र देश देह बनाता है…
* कर वासना राष्ट्र निर्माण कि राह का रोड़ा बना हुआ है…
* जबकि करणाम वासना मिल का पत्थर साबित है---
* …राजनयिक लीडर एक जुट हो कर उपभोग करते हुए बिना डर, डकारते हुए आसमान में घूमते फ़िरते भी हैं…,
* करदाता को शब्दजाल मे उलझा कर एकता का पाठ पढ़ाते है और पुल नदी नाला बांधने का सपना दिखा कर राजगद्दी पर विराजमान पुनः होते जा रहे हैं…
* स्वनामवासना राष्ट्र को ऋणमुक्त, समाज को भ्रष्टाचार मुक्त, स्व आर्थिक आजादी से भ्रम भटकाव टकराव विकृति से बचने मे मदद करता है…
निष्कर्ष : -
“इमानदार व्यक्ति करदान छोटे बड़े 052 अक्षर बिज़ मानकर करभुगतान को माध्यम मानता है---
* इन्सान अपने नामका शून्यशून्यपाच प्रतिशत कर को क़र्ज़ मान, अपना करभुगतान फ़र्ज़ समझकर, सम्मान का हक़दार है …
* देश में "करदाता आर्थिक आज़ादी का इमानदार सैनिक है…।”
* इमानदार करदाता इन्सान लक्ष्यधारी, मूल्यवान, प्रकृति-सिद्धांत, मानव नियम केसाथ चलने वाला, साधारण सरल सुगम उपलब्ध व्यक्ति पवित्रता कि मूर्तिहोता है---
* इमानदार करदाता भारत को आर्थिक गुलामी से मुक्त करने, भ्रष्टाचार मुक्त व्यक्ति से देश हितैषी, आर्थिक आजाद बन समाज राज्य को परिवर्तिन की राह देता है…
* इमानदार शुन्यपाच अग्यानी आत्मनिर्भरता की पगडंडी पर चलकर अन्य को सफ़ल बनने बनाने कि राष्ट्रीय राज मार्ग ÑHI पर दौड़ शुरू कर आधार पर कर्ता है…
* “नाम वासना से स्वनाम तक, स्वनाम से राष्ट्र भक्ति तक, देहधन से आर्थिक आजादि तक” — यही स्वनाम स्वर अक्षर शब्द मूल्य मुखिया, आर्थिक गुलमी से सर्वागिण विकसित भक्ति और ज्ञान विज्ञान अध्यात्म का संगम युग, करमुक्ति का मार्ग है…।
* सौ चूहे खा बिल्ली हज़ को चली
* (संक्षिप्त, सारगर्भित, संपूर्ण ब्रह्माण्ड समाया हुआ लेख)---
* यह कहावत केवल व्यंग्य नही, बल्कि मानव चरित्र का दर्पण है…
* आज का मनुष्य भी “बिल्ली” की तरह है…—
* भोग, छल, कपट और लोभ से जीवन का अमृत पी रहा है ...
* फ़िर भी हक़ीक़त मे आनन्द प्रमोद संगीतमय जीवन का आनंद नहि ले पा रहा है क्यो…
* क्योकि प्राकृतिक सिद्धांत का "करज्ञान" बिना, दीया गया कर भुगतान कर्ता फ़रिश्ता स्वरूप ॐ सणभव नही है…
* शब्दजाल मे दिखावे की चादर ओढ़कर सरकार देश भ्रमण तीरथ “हज़ या हज” की यात्रा स्पॉन्सर कर सिंपैथी गेन करती है…
* शब्द जाल के कारण रब अल्लाह ईश्वर, वाहेगुरु, सत्साईनाम आदि के मध्य भ्रम भटकाव पैदा कर, आध्यात्मिक औद्योगिक गुरू भ्रमणजाल मे फ़साकर घूमने फिरने मे कर उपयोग करते है---
गूढ़ अर्थ :-
* “सौ चूहे” = मनुष्य की अज्ञानता नहि, वासना, स्वार्थ, सिध्दि का माध्यम अनादि काल से है---
* पापियों की संख्या दिनप्रतिदिन बढ़ते जा रही है---
* “हजारो हज यात्री बन” आत्मशुद्धि की यात्रा, ईश्वर के निकट पहुचने मे असफल प्रयास है…
* “बिल्ली” = वह मानव जो भीतर से असत्य, बाहर से अपने आप को धार्मिक दिखाता है---
* सत्य यही है –
* भक्ति मुख पर नही, हृदय मे फ़ल फूल पत्ती तना खा पीकर जनम लेती देती होती है…
* ईश्वर इमानदारि का कर्मफ़ल, प्रसन्न हो अपने पुजारि को निश्चित स्थान और समय पर, कर रूप बदल भुगतान कर्ता फ़रिश्ता ॐ है…
* करको पुनः शूणय एकपाच करने के पश्चात शुन्यएक पर लगातार वृद्धि कर कपट से नही इमानदारी पर देता है…
* इमानदार मन, वचन, और कर्म वाला इन्सान शब्द मूल्यजानकार एक से अनन्त का प्रेरणा स्रोत बनता है —
* सच्चा साधक जो कर ज्ञान विज्ञान अध्यात्म संयुक्त शू|शुन्य05 का रहस्य और सामणजस्य मे भी नर से णारायण कि का परिणाम विष्णु नामधारी को मुखिया पद दिलाने मे सक्षम बनाता है---
ब्रह्माण्ड का सिद्धांत :- >
* “प्रकृति कभी झूठ नही स्वीकारती है…
* झूठा, भले कुछ पल चमके, पर इमानदार ही युनिवर्ष का केन्द्र है…।”
* जिसने अपने भीतर के “सौ चूहो”->
अहंकार, लालच, छल, मोह, और ईर्ष्या जैसों को सत्य, प्रेम, और करुणा से रूपांतरित कर से कर्ता फ़रिश्ता है…
* इमानदार नामस्वर के अधर आधार पर हाजी हजकरने नही जाता, बल्कि हज स्वयम मे प्रकट कर समाज राज्य देश विदेश मे प्रचारक हाजी बन जाता है---
निष्कर्ष :- > “सौ चूहे खा बिल्ली हज को चली” —
* यह कहावत बाहरी नही, भीतरी चेतना की पुकार है…
* जब तक भीतर पशु प्रवृत्तिया जीवित हैं...
* कोई भी इंसान तीर्थटन कर समाज जाति योगी सरकार सच्चा नही देश हितैषी नहि बन सकता है…
* इमानदार हज यात्री— आत्मा की शुद्धिकारण है…
* इमानदार धर्मावलंबी— इमानदार करदाता अपनी ख़ुद कि राह पर जीवन मे प्रकृति स्वयम सहयोगी करदाता बना देती है---
* “जो अपने भीतर के (चूहो) दोष को मार दे, वही बिल्ली(इमानदार इन्सान से ) देवता बन जाता है---—
यही संपूर्ण ब्रह्माण्ड का सार है।”